झुकी हुई पाषाण प्रतिमा भी अपने स्थान पर अडिग, गणेशोत्सव में उमड़ते हैं हजारों श्रद्धालु
खंडवा। दादाजी की नगरी खंडवा धार्मिक आस्था और प्राचीन मंदिरों की परंपरा के लिए अपनी अलग पहचान रखती है। शहर के पुराने सराफा बाजार के बीच स्थित प्राचीन स्वयंभू श्री चिंतामण गणेश मंदिर भी इसी धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। व्यापारिक गतिविधियों के बीच स्थित यह मंदिर वर्षों से श्रद्धालुओं के लिए आस्था, विश्वास और मनोकामना का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
सराफा बाजार में आने वाले लोगों के लिए यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि शहर की पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की पहचान भी है। गणेशोत्सव के दौरान मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं और बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान गणेश के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

स्वयंभू मानी जाती है भगवान गणेश की प्रतिमा
मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां विराजित भगवान गणेश की पाषाण प्रतिमा को माना जाता है। स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार यह प्रतिमा स्वयंभू है, अर्थात इसे किसी व्यक्ति द्वारा स्थापित किए जाने के बजाय स्वयं प्रकट हुई माना जाता है। इसी कारण भक्तों के बीच इस मंदिर की विशेष धार्मिक प्रतिष्ठा है।
मंदिर से जुड़े लोगों और पूर्व में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार भगवान गणेश की यह प्रतिमा अपनी जगह पर कुछ कोण पर झुकी हुई दिखाई देती है, लेकिन बिना किसी बाहरी सहारे के लंबे समय से उसी स्थिति में विद्यमान है। स्थानीय श्रद्धालु इसे भगवान गणेश का चमत्कार और मंदिर की विशेष पहचान मानते हैं।
मंदिर की प्राचीनता को लेकर अलग-अलग उल्लेख
सराफा स्थित इस गणेश मंदिर की प्राचीनता को लेकर अलग-अलग समय में अलग-अलग उल्लेख सामने आए हैं। वर्ष 2019 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में मंदिर को आठवीं शताब्दी का बताया गया था तथा उसमें यह भी उल्लेख था कि पुरातत्व विभाग के एक दल ने मंदिर की प्राचीनता करीब 1200 वर्ष बताई थी। वहीं हाल की स्थानीय रिपोर्टों में इसे लगभग 700 वर्ष पुरानी स्वयंभू गणेश प्रतिमा वाला मंदिर बताया गया है।

इस तरह मंदिर की सही ऐतिहासिक आयु को लेकर विभिन्न स्रोतों में अलग-अलग दावे मिलते हैं। हालांकि, इतना स्पष्ट है कि सराफा क्षेत्र में स्थित यह गणेश मंदिर लंबे समय से स्थानीय धार्मिक परंपरा और जनआस्था का हिस्सा रहा है।
होलकर काल से जुड़ा मंदिर निर्माण का उल्लेख
मंदिर के इतिहास से जुड़ी स्थानीय जानकारी में यह भी उल्लेख मिलता है कि यहां पूर्व में एक छोटा मंदिर था, जिसे होलकर स्टेट के समय बनवाया गया था। बाद में सराफा क्षेत्र के व्यापारियों और संगठन से जुड़े लोगों के सहयोग से मंदिर का जीर्णोद्धार कर वर्तमान भव्य स्वरूप प्रदान किया गया।
वर्तमान मंदिर में राजस्थान के मार्बल का उपयोग किया गया है। मंदिर की दीवारों और परिसर में आकर्षक नक्काशी के साथ भगवान शिव परिवार तथा अष्टविनायक के स्वरूपों को उकेरा गया है। मंदिर का ऊंचा शिखर इसकी भव्यता को और बढ़ाता है। पूर्व में प्रकाशित जानकारी के अनुसार मंदिर के शिखर की ऊंचाई करीब 51 फीट बताई गई है।
अष्टविनायक और शिव परिवार की आकर्षक नक्काशी
मंदिर के जीर्णोद्धार के दौरान इसकी वास्तुकला और सजावट पर विशेष ध्यान दिया गया। राजस्थान के कारीगरों द्वारा किए गए मार्बल कार्य में धार्मिक आकृतियों और नक्काशी को प्रमुख स्थान दिया गया। मंदिर की दीवारों पर अष्टविनायक के स्वरूप श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र हैं। वहीं शिव परिवार की आकृति भी मंदिर की धार्मिक सुंदरता को बढ़ाती है।
इस प्रकार मंदिर में प्राचीन आस्था और आधुनिक जीर्णोद्धार का एक सुंदर संगम देखने को मिलता है।
गणेशोत्सव में बदल जाता है पूरा सराफा क्षेत्र
गणेश चतुर्थी के अवसर पर सराफा स्थित यह मंदिर विशेष रूप से आकर्षण का केंद्र बन जाता है। गणेशोत्सव के दौरान भगवान गणेश का प्रतिदिन अभिषेक, विशेष श्रृंगार और आरती की जाती है। सुबह और रात की आरती में श्रद्धालुओं की भागीदारी रहती है।
गणेशोत्सव के दिनों में मंदिर में भगवान गणेश के अलग-अलग श्रृंगार किए जाते हैं। दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु भगवान के समक्ष पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।
व्यापारियों की आस्था का भी प्रमुख केंद्र
सराफा बाजार शहर का प्रमुख व्यापारिक क्षेत्र है और यहां लंबे समय से व्यापार करने वाले परिवारों के लिए यह मंदिर विशेष महत्व रखता है। दिनभर बाजार की व्यस्तता के बीच मंदिर में श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है।
कई व्यापारी अपने दिन की शुरुआत भगवान गणेश के दर्शन और पूजा से करते हैं। व्यापार में विघ्न दूर करने और समृद्धि की कामना के साथ भगवान गणेश को प्रथम पूज्य मानकर यहां पूजा-अर्चना की जाती है। इसी कारण मंदिर को सराफा बाजार की धार्मिक पहचान से भी जोड़कर देखा जाता है।
श्रद्धा और विरासत का संगम
खंडवा के प्राचीन धार्मिक स्थलों की चर्चा में सराफा का यह गणेश मंदिर अपनी अलग पहचान रखता है। एक ओर यहां स्वयंभू गणेश प्रतिमा को लेकर गहरी धार्मिक आस्था है, वहीं दूसरी ओर मंदिर से जुड़ी प्राचीनता की मान्यताएं इसे शहर की धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती हैं।
सदियों पुरानी मानी जाने वाली आस्था, पाषाण प्रतिमा की विशिष्ट स्थिति, होलकर काल से जुड़ा मंदिर निर्माण का स्थानीय उल्लेख और बाद में किए गए भव्य जीर्णोद्धार ने इस मंदिर को वर्तमान स्वरूप दिया है।
आज सराफा बाजार की चहल-पहल के बीच स्थित यह मंदिर श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। गणेशोत्सव हो या सामान्य दिन, भगवान चिंतामण गणेश के दर्शन के लिए आने वाले भक्तों की आस्था यह बताती है कि समय बदलता रहा, बाजार का स्वरूप बदलता रहा, लेकिन इस प्राचीन गणेश दरबार से जुड़ा विश्वास आज भी कायम है।
सराफा के बीच विराजित यह स्वयंभू गणेश मंदिर खंडवा की धार्मिक आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत की ऐसी पहचान है, जिसे शहर की पुरानी धार्मिक धरोहरों में विशेष स्थान प्राप्त है।















