चल रही है चर्चा ..न्यूज़ वही जो चले चर्चा में हो……
प्रोटोकॉल के नाम पर ‘पैसों का प्रबंधन’, बेटा बना माध्यम!
125 छात्रावासों से हर माह वसूली—खुली परतें तो जांच इधर, पत्रकारों पर कार्रवाई उधर

चर्चा न्यूज़ विशेष……
खंडवा,(सुशील विधाणी)
जनजातीय कार्य विभाग में तबादलों पर रोक लगने के बाद अब उन व्यवस्थाओं की परतें खुलने लगी हैं, जो लंबे समय से अंदरखाने संचालित हो रही थीं। “प्रोटोकॉल” और “खर्च” जैसे शब्दों की आड़ में जो तंत्र खड़ा किया गया था, वह अब सवालों के घेरे में है।
सूत्रों के अनुसार, जिले के करीब 125 छात्रावासों से अधीक्षकों से हर माह 1500 से 2000 रुपए तक की राशि ली जाती थी। इस प्रकार हर महीने लाखों रुपए की वसूली होने की बात सामने आ रही है।
सबसे चौंकाने वाला पहलू यह बताया जा रहा है कि यह राशि सीधे अधिकारियों तक न जाकर कथित रूप से परिवारिक खातों, विशेषकर “पुत्र के नाम” पर जमा करवाई जाती थी। इससे पूरे मामले की गंभीरता और बढ़ जाती है।
61 ट्रांजेक्शन से खुला राज, पर कहानी अभी बाकी
प्रारंभिक जांच में सामने आए ट्रांजेक्शन इस पूरे मामले का केवल एक हिस्सा माने जा रहे हैं। विभागीय जानकारों का कहना है कि यह आंकड़ा वास्तविकता से कहीं कम हो सकता है।
यह भी बड़ा सवाल बनकर सामने आया है कि इतने बड़े स्तर पर ट्रांसफर और वित्तीय लेनदेन बिना प्रभारी मंत्री और कलेक्टर के संज्ञान के कैसे संभव हुआ?
या फिर यह मान लिया जाए कि मामला केवल विभागीय नहीं, बल्कि “ऊपर तक फैले सिस्टम” का हिस्सा था।
ट्रांसफर-पोस्टिंग और वसूली का कथित गठजोड़
विभाग में लंबे समय से ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर चर्चाएं होती रही हैं, लेकिन अब जो तथ्य सामने आ रहे हैं, वे यह संकेत देते हैं कि
स्थानांतरण केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक “प्रभावित तंत्र” का हिस्सा बन चुके थे।
खर्च और प्रोटोकॉल के नाम पर वसूली ने यह साफ कर दिया है कि व्यवस्थाओं के नाम पर एक समानांतर आर्थिक व्यवस्था संचालित हो रही थी।
जांच शुरू, पर कार्रवाई किस दिशा में?
मामला उजागर होने के बाद प्रशासन हरकत में आया और “कार्रवाई” के तहत जांच टीम का गठन किया गया। अधिकारियों को रिकॉर्ड खंगालने और तथ्यों को एकत्रित करने के निर्देश दिए गए हैं।
लेकिन इसी के साथ एक दूसरा पहलू भी सामने आया है—
जहां भ्रष्टाचार के आरोपों पर जांच की प्रक्रिया शुरू होती है, वहीं दूसरी ओर खबर उजागर करने वालों पर तेजी से कार्रवाई होती नजर आ रही है।
पत्रकारों पर दबाव के आरोप
सूत्रों के अनुसार, इस पूरे मामले को उजागर करने के बाद कुछ पत्रकारों को निशाने पर लिया जा रहा है।
झूठे आवेदन, मौखिक शिकायतें और प्रशासनिक दबाव के माध्यम से खबरों को रोकने का प्रयास किए जाने की चर्चाएं हैं।
यह स्थिति केवल एक प्रकरण नहीं, बल्कि उस सोच को दर्शाती है, जिसमें
“सवाल उठाने वालों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।”
प्रशासनिक संतुलन पर उठते सवाल
यह पूरा घटनाक्रम अब एक बड़े सवाल को जन्म देता है—
क्या प्रशासन का रवैया संतुलित है?
एक ओर भ्रष्टाचार के मामलों में “जांच जारी” का सिलसिला चलता है,
तो दूसरी ओर केवल एक आवेदन के आधार पर पत्रकारों पर प्रकरण दर्ज होने की बात सामने आती है।
चल रही है चर्चा…
कि ट्रांजेक्शन तो सिर्फ एक झलक हैं, असली खेल इससे कहीं बड़ा है।
कि इतने बड़े स्तर पर ट्रांसफर और वसूली बिना ऊपरी संज्ञान के संभव नहीं।
कि “प्रोटोकॉल” और “खर्च” केवल नाम थे, असल में व्यवस्था कुछ और ही थी।
और यह भी चर्चा में है…
कि जैसे ही सच सामने आया, निशाना व्यवस्था नहीं—बल्कि सवाल उठाने वाले बन गए।
झूठे आवेदन, मौखिक दबाव और प्रशासनिक आड़ लेकर खबरों को रोकने का प्रयास जारी है।
पर चर्चा यहां भी नहीं रुकती…
कि छोटे स्तंभ का मीडिया भी अब खामोश रहने वाला नहीं है।
सच को कागजों के बोझ और दबाव की राजनीति से दबाया नहीं जा सकता।
और अब सबसे तीखी चर्चा…
कि भ्रष्टाचार उजागर होते ही “कार्रवाई” के नाम पर जांच टीम जरूर बनती है,
लेकिन सिर्फ एक आवेदन पर पत्रकार पर प्रकरण दर्ज हो जाता है।
भ्रष्टाचार करने वालों पर “जांच जारी”…
और भ्रष्टाचार उजागर करने वालों पर “प्रकरण दर्ज”—
क्या यही खंडवा प्रशासन की कार्यशैली है?
अब सवाल सीधे हैं—
क्या सच सामने लाना अपराध है?
या फिर सच को दबाना ही व्यवस्था का नया नियम बनता जा रहा है?
निष्कर्ष
क्योंकि अब बात सिर्फ वसूली की नहीं…
बल्कि व्यवस्था की विश्वसनीयता की है।
खेल बड़ा है… खिलाड़ी उससे भी बड़े…
पर अब नजरें भी उतनी ही तेज हो चुकी हैं।















