“हाईकोर्ट तक गुहार, फिर भी नहीं मिला हक…भटके किसान, टूटता भरोसा”
“जनसुनवाई में फूटा गुस्सा, रास्ता नहीं तो हक कैसे? गिरफ्तारी पर उठे सवाल”
खंडवा/चर्चा न्यूज़
( सुशील विधाणी)
खंडवा। जिले की जनसुनवाई में मंगलवार को जमीन विवाद ने उस समय उग्र रूप ले लिया, जब वर्षों से न्याय की तलाश में भटक रहे किसानों का सब्र जवाब दे गया। छैगांवमाखन तहसील के ग्राम बरूड़ से पहुंचे किसान रामनारायण मौजीलाल और श्याम रामनारायण ने कथित अन्याय के खिलाफ हंगामा कर दिया, जिसके बाद प्रशासन ने दोनों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।

मामला केवल खेत के रास्ते का नहीं, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे न्यायिक और प्रशासनिक संघर्ष का है। किसानों का कहना है कि उनकी वर्ष 1981 की वैध जमीन रजिस्ट्री को गलत ठहराया जा रहा है, जिससे वे करीब 8 एकड़ भूमि पर पिछले तीन वर्षों से खेती नहीं कर पा रहे। सिंचाई सुविधा होने के बावजूद खेत खाली पड़े हैं। उनका आरोप है कि वर्ष 2019 में जमीन खरीदने के बाद रास्ता बंद कर दिया गया, जबकि पुरानी रजिस्ट्री में रास्ता दर्ज था।
पीड़ितों का दावा है कि वे तहसील और एसडीएम कोर्ट से मामला जीत चुके थे, लेकिन बाद में अपर कलेक्टर स्तर पर आदेश बदल दिया गया। इसके बाद मामला इंदौर, ग्वालियर राजस्व मंडल और जबलपुर हाईकोर्ट तक पहुंचा। किसानों के अनुसार, उच्च स्तर पर आदेश निरस्त होने के बावजूद जमीनी स्तर पर उन्हें राहत नहीं मिली।

किसानों ने यह भी आरोप लगाया कि राजस्व निरीक्षक, पटवारी और अन्य अधिकारी उन पर लगातार दबाव बना रहे हैं। उनका कहना है कि उन्हें परेशान कर समझौते के लिए मजबूर किया जा रहा है। कई वर्षों से जनसुनवाई के चक्कर लगाने के बाद भी जब समाधान नहीं मिला, तो उनका आक्रोश सामने आ गया।
सरकारी नियम पर भी सवाल:
मध्य प्रदेश सरकार द्वारा हाल ही में ऐसे मामलों के लिए स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि यदि किसी किसान के खेत तक जाने का रास्ता नहीं है, तो वह शासकीय प्रक्रिया के तहत आवेदन देकर रास्ता प्राप्त कर सकता है। इसके लिए राजस्व विभाग को नियमानुसार मार्ग उपलब्ध कराने की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होती है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब नियम मौजूद हैं, तो फिर वर्षों से भटक रहे किसानों को इसका लाभ क्यों नहीं मिल पाया?
गिरफ्तारी पर उठे सवाल:
जनसुनवाई में हंगामे के बाद प्रशासन ने दोनों किसानों को धारा 151 और 170 बीएनएसएस के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। सिटी मजिस्ट्रेट बजरंग बहादुर सिंह के अनुसार, किसानों ने अभद्र व्यवहार किया और स्थिति बिगड़ने लगी थी, इसलिए कार्रवाई की गई।
लेकिन बड़ा सवाल यही है कि वर्षों से न्याय के लिए भटकते किसानों का गुस्सा अगर जनसुनवाई में फूटता है, तो क्या उसका समाधान संवाद से नहीं होना चाहिए था? क्या न्याय की गुहार लगाते-लगाते थक चुके किसानों को जेल भेजना उचित कदम है?
यह मामला अब केवल एक गांव या दो किसानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक संवेदनशीलता, नियमों के पालन और न्याय की उपलब्धता पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। अब देखना होगा कि शासन-प्रशासन इस मामले में क्या रुख अपनाता है और क्या वास्तव में पीड़ित किसानों को उनका हक मिल पाता है।
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