खंडवा के महिला बाल विकास में फिर “सीजनल ऑफर”: पदस्थापना के साथ बोनस में रिश्वत पैकेज!

महानिदेशक योगेश देशमुख के सख्त निर्देशों के बाद लोकायुक्त संगठन, इंदौर की ट्रैप कार्रवाई
— 5 हजार लेते रंगे हाथों पकड़ी गई पर्यवेक्षक, 2 लाख की डील पर भी थी बातचीत
खंडवा जिले के खालवा क्षेत्र में महिला एवं बाल विकास विभाग में भ्रष्टाचार अब “आधा-वार्षिक उत्सव” सा प्रतीत होने लगा है। साल में दो बार कार्रवाई और फिर वही फाइलों की खामोशी — मानो विभाग ने इसे नियमित प्रक्रिया का हिस्सा मान लिया हो। इस बार फिर लोकायुक्त की टीम ने दस्तक दी और “रिश्वत पैकेज” का ताज़ा संस्करण सामने आ गया।
मामला क्या है?
आवेदिका श्रीमती सलिता पालवी (उम्र 27 वर्ष), सहायिका, आंगनवाड़ी केन्द्र-1 मोजवारी, ने शिकायत की कि उन्हें कार्यकर्ता पद पर पदस्थापना के लिए मोटी रकम की मांग की गई। आरोप है कि महिला बाल विकास पर्यवेक्षक (संविदा) श्रीमती अजिला मोहे ने—
पहले सहायिका पद पर नियुक्ति के एवज में 5,000 रुपये
और आंगनवाड़ी केन्द्र-3 मोजवारी में कार्यकर्ता पद पर नियुक्ति के लिए 2,00,000 रुपये
यानी कुल 2,05,000 रुपये की मांग की।
पद वही, विभाग वही, लेकिन दरें “अपग्रेड” — मानो पदस्थापना नहीं, प्लॉट की रजिस्ट्री हो!
शिकायत से ट्रैप तक
शिकायत पुलिस अधीक्षक, लोकायुक्त कार्यालय इंदौर को दी गई। सत्यापन में मामला सही पाया गया और 26 फरवरी 2026 को ट्रैप दल गठित किया गया। टीम ने आरोपिया को 5,000 रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया।
अब उनके विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम 2018 की धारा 7 के तहत कार्रवाई जारी है।
ट्रैप दल में शामिल अधिकारी
कार्यवाहक निरीक्षक श्रीमती प्रतिभा तोमर,
कार्यवाहक निरीक्षक श्री आशुतोष मिठास,
आरक्षक विजय कुमार, शिवप्रकाश पाराशर, कमलेश परिहार, आदित्य सिंह भदौरिया, मनीष माथुर,
महिला आरक्षक अनिता प्रजापति सहित पूरी टीम ने कार्रवाई को अंजाम दिया।
हर साल लोकायुक्त की दो बड़ी कार्रवाइयाँ इस विभाग में दस्तक देती हैं, पर व्यवस्था के चेहरे पर शिकन तक नहीं आती।
कार्रवाई की सुर्खियाँ बदलती हैं, लेकिन दफ्तरों की कार्यशैली नहीं।
रंगे हाथों गिरफ्तारी होती है, फाइलें बनती हैं, बयान दर्ज होते हैं —
पर कुछ ही महीनों में सब कुछ फिर “सामान्य प्रक्रिया” की तरह चलने लगता है।
लगता है मानो लोकायुक्त की कार्रवाई यहाँ चेतावनी नहीं, वार्षिक औपचारिकता बन चुकी हो।
डर का असर क्षणिक है, लेकिन व्यवस्था की आदत स्थायी।
सवाल यह है कि जब हर साल भ्रष्टाचार उजागर हो रहा है,
तो क्या सिस्टम ने शर्म खो दी है — या जवाबदेही अभी भी फाइलों में बंद है?
महिला बाल विकास कार्यालय खंडवा के अंतर्गत यह पहली कार्रवाई नहीं है। विभाग में साल में दो बार लोकायुक्त की एंट्री अब “रूटीन निरीक्षण” जैसी लगने लगी है। हर बार वही कहानी — शिकायत, ट्रैप, गिरफ्तारी, और फिर कुछ समय बाद सब सामान्य।
प्रश्न यह है कि क्या कार्रवाई केवल “रंगे हाथ पकड़ने” तक सीमित रहेगी?
या विभागीय व्यवस्था में भी कोई स्थायी सुधार होगा?
जब बच्चों और महिलाओं के पोषण व सशक्तिकरण का जिम्मा संभालने वाला विभाग ही “नियुक्ति बाजार” में बदल जाए, तो यह केवल एक कर्मचारी का मामला नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है।
निष्कर्ष
लोकायुक्त की कार्रवाई सराहनीय है, पर अगर हर छह महीने में वही दृश्य दोहराया जाए, तो यह सिस्टम की मजबूती नहीं, उसकी आदत बन जाने का संकेत है।
खंडवा के महिला बाल विकास कार्यालय में भ्रष्टाचार अब अपवाद नहीं, “प्रक्रिया” जैसा प्रतीत होने लगा है।
अब देखना यह है कि अगली कार्रवाई कब होती है — या इस बार कुछ सच में बदलेगा?















