वायरल वीडियो से जागा सिस्टम या फिर वही पुरानी नींद? धर्मपुरी से एकता नगर तक गायों की मौत पर सवाल
खंडवा जिले में इन दिनों दो घटनाएं चर्चा के केंद्र में हैं—एक धर्मपुरी गौशाला की और दूसरी एकता नगर के आगे सुनसान पटरी पर मिली गाय के शव की। दोनों घटनाएं अलग जरूर हैं, लेकिन सवाल एक ही खड़ा करती हैं: क्या गायें केवल नारों और अनुदान की फाइलों तक सीमित रह गई हैं?
धर्मपुरी गांव की गौशाला में मरी हुई गायों के वीडियो वायरल होते ही प्रशासन हरकत में आया। निरीक्षण हुआ, बयान लिए गए, कागज खंगाले गए। लेकिन वीडियो में दिखती सच्चाई कागज़ों से कहीं ज्यादा बदबूदार थी—कई दिनों से पड़े शव, बीमार और कमजोर गायें, चारे और पानी की किल्लत, और जिम्मेदारों का बेपरवाह रवैया।
सबसे ज्यादा चुभने वाला बयान गौशाला संचालक का रहा—
“134 गायों में एक भी काम की नहीं है…”
यह वाक्य केवल असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि गौसेवा की आत्मा पर प्रहार है। गौशाला का अस्तित्व ही उन बेसहारा, बूढ़ी और बीमार गायों के लिए है जिन्हें ‘काम की’ नहीं समझा जाता। अगर वही बोझ लगने लगें, तो फिर अनुदान किसलिए? सेवा किसलिए? और संवेदना किसलिए?
गौशालाओं को शासन से सहायता मिलती है, समाज से दान मिलता है। योजनाएं कागजों में मजबूत हैं। लेकिन सवाल यह है कि जमीन पर गायें क्यों तड़प रही हैं? क्या निरीक्षण केवल हस्ताक्षर तक सीमित है? क्या पशु चिकित्सा विभाग की भूमिका औपचारिकता भर रह गई है?
और फिर सामने आती है दूसरी घटना—एकता नगर के आगे सुनसान पटरी पर पड़ी एक गाय का शव। वीडियो वायरल हुआ, सनसनी फैली, हिंदू संगठन पहुंचे, पुलिस आई। पहले इसे जलाने की आशंका बताया गया, फिर डॉक्टर की जांच में सामने आया कि शव कई दिन पुराना था, जानवरों द्वारा नोचे जाने से खून फैला और भ्रम पैदा हुआ। अंततः शव को सम्मानपूर्वक दफनाया गया।
यहां सवाल किसी संगठन या प्रशासन की तत्परता पर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर है जहां गायें सड़कों और पटरियों पर दम तोड़ रही हैं और हमें सच्चाई जानने के लिए वायरल वीडियो का इंतजार करना पड़ता है।
कल गौशाला में शव, आज सुनसान पटरी पर शव।
कल निरीक्षण, आज बयान।
कल आक्रोश, आज सफाई।
पर असली सवाल जस का तस—
मध्य प्रदेश शासन की योजनाओं और अनुदान के बावजूद गायों की देखभाल सही तरीके से क्यों नहीं हो पा रही?
क्या गौसेवा अब भावनाओं का विषय कम और फंड का विषय ज्यादा बनती जा रही है? क्या जिम्मेदारी तय होगी या फिर जांच की फाइलें समय के साथ धूल फांकेंगी?

धर्मपुरी की गौशाला और एकता नगर की घटना केवल स्थानीय समाचार नहीं, बल्कि एक आईना हैं। आईना जो दिखा रहा है कि नारों और वास्तविकता के बीच कितनी दूरी है।
अब देखना यह है कि प्रशासन की यह जागरूकता स्थायी रहती है या वायरल वीडियो की तरह कुछ दिनों में फीकी पड़ जाती है।
क्योंकि गाय केवल आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि हमारी संवेदनशीलता की परीक्षा भी है—
और फिलहाल यह परीक्षा व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर रही है।
चल रही है चर्चा…….















