जीत का जश्न या हमला?
बड़नगर दंगल के बाद पहलवानों पर वार
खंडवा/चर्चा न्यूज़ विशेष
(सुशील विधाणी)
खेल हमें जोड़ता है, ऐसा किताबों में लिखा जाता है… लेकिन बड़नगर दंगल ने बता दिया कि कुछ लोग इसे “तोड़ने” का भी हुनर रखते हैं। जीत का जश्न अभी ठीक से मनाया भी नहीं गया था कि हार का ग़ुस्सा चाकू और सरियों में बदलकर मैदान के बाहर उतर आया।

उज्जैन जिले के बड़नगर में आयोजित दंगल के बाद खंडवा के पहलवानों को शायद यह अंदाज़ा नहीं था कि मेडल के साथ “हमले का बोनस पैकेज” भी मिलेगा। जीतकर लौट रहे पहलवानों पर देर रात घेराबंदी कर ऐसा हमला हुआ, मानो कुश्ती नहीं, कोई पुरानी दुश्मनी का हिसाब बराबर किया जा रहा हो।
मामला तब बिगड़ा जब खंडवा के उभरते पहलवान राजेश प्रजापत उर्फ “राजेश काला” ने स्थानीय पहलवान को पटखनी दे दी। बस फिर क्या था—खेल भावना ने वहीं दम तोड़ दिया और हार की चोट सीधे सरिया बनकर सिर पर उतर आई। आरोप है कि विरोधी पक्ष ने “रिव्यू मैच” की जगह “रिवेंज अटैक” का विकल्प चुन लिया।

बताया जा रहा है कि देर रात करीब 12 बजे आरोपियों ने घेरकर हमला किया। एक तरफ सरियों से वार, दूसरी तरफ चाकू से हमला—मानो दंगल का अगला राउंड “नो-रूल्स फाइट” में बदल गया हो। इस हमले में दो पहलवान गंभीर रूप से घायल हो गए, जिनमें एक की हालत नाज़ुक बताई जा रही है।
प्रदेशभर के पहलवानों में इस घटना को लेकर आक्रोश है। उनका कहना है कि अगर सुरक्षा व्यवस्था ऐसी ही “मौजूद लेकिन गायब” रही, तो भविष्य में पहलवानों को दांव-पेंच के साथ “सेल्फ-डिफेंस किट” भी साथ रखनी पड़ेगी।
दंगल में हार-जीत तो खेल का हिस्सा है, लेकिन अगर हारने वाला “खेल” छोड़कर “खेलाड़ी” पर ही उतर आए—तो समझिए, अखाड़ा नहीं, मानसिकता हार गई है।
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