टाकली कला में खेत बना रणक्षेत्र: जमीन विवाद या प्रशासनिक लापरवाही की उपज?
चर्चा न्यूज़
खंडवा जिले के पंधाना थाना क्षेत्र अंतर्गत बोरगांव चौकी के ग्राम टाकली कला में एक बार फिर वही हुआ, जिसकी आशंका गांव वाले लंबे समय से जता रहे थे। वर्षों से चला आ रहा जमीन विवाद इस कदर भड़का कि खेत में काम कर रही आदिवासी महिलाएं मारपीट का शिकार हो गईं। घटना ने न सिर्फ कानून-व्यवस्था, बल्कि प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
चर्चा इस बात की नहीं है कि जमीन विवाद क्यों हुआ—क्योंकि टाकली कला में यह विवाद अब सामान्य खबर बन चुका है। चर्चा इस बात की है कि जब विवाद पहले से प्रशासन के संज्ञान में था, तो समय रहते समाधान क्यों नहीं निकला? क्या सीमांकन, रिकॉर्ड सुधार और स्पष्ट आदेश सिर्फ फाइलों की शोभा बढ़ाने के लिए होते हैं?

ग्रामीण बताते हैं कि इस जमीन को लेकर कई बार आवेदन, शिकायतें और समझाइश हो चुकी है। हर बार भरोसा मिला—“जांच चल रही है।” लेकिन जांच की रफ्तार इतनी धीमी रही कि उससे पहले विवाद ने हिंसक रूप ले लिया। सवाल उठ रहा है कि अगर पीड़ित आदिवासी महिलाएं न होतीं, तो क्या प्रशासन की सक्रियता पहले ही दिख जाती?
यह मामला इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि मारपीट खेत में काम कर रही महिलाओं के साथ हुई—यानी वे लोग, जो पहले ही सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर हैं। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि क्या आदिवासी होना सुरक्षा में कटौती का कारण बनता जा रहा है?
घटना के बाद पुलिस कार्रवाई की बात कह रही है, लेकिन गांव में यह आम धारणा बन चुकी है कि कार्रवाई अक्सर “घटना के बाद” ही क्यों होती है, “घटना से पहले” क्यों नहीं? क्या प्रशासन की भूमिका सिर्फ पंचनामा, बयान और आश्वासन तक ही सीमित रह गई है?

टाकली कला की यह घटना अब सिर्फ एक गांव का मामला नहीं रही। यह पूरे जिले में चर्चा का विषय है कि जमीन विवादों को लेकर प्रशासन की निष्क्रियता आखिर कब तक लोगों को भुगतनी पड़ेगी? और क्या अगली बार भी किसी कमजोर तबके को ही इसकी कीमत चुकानी होगी?
फिलहाल गांव में शांति है, लेकिन सवाल अब भी ज़िंदा हैं—
क्या प्रशासन जागेगा या अगली मारपीट के बाद फिर “जांच जारी है” की वही लाइन दोहराई जाएगी?
चल रही है चर्चा…….















