‘यह खंडवा है जनाब लाइनें सुशील विधाणी’…
यह खंडवा है जनाब,
यहाँ मान–सम्मान किसी डिग्री से नहीं,
डिग्री के साथ लगी रकम से तय होता है।
यहाँ सम्मान मंच पर नहीं,
परदे के पीछे की सहमति से मिलता है।
यहाँ छठवीं फेल
एचडी का मज़ा ले रहा है,
और पीएचडी किया हुआ
सलामी ठोकने की मुद्रा में खड़ा है।
ज्ञान यहाँ योग्यता नहीं,
असुविधा बन चुका है।
यह खंडवा है जनाब,
जहाँ कुर्सियाँ बदली नहीं जातीं,
बस चेहरे जम जाते हैं।
बरसों नहीं, दशक निकल जाते हैं,
एक ही विभाग, एक ही क्षेत्र,
एक ही टेबल—
और वही व्यक्ति,
रिटायरमेंट तक “अपरिहार्य” बना रहता है।
यह शायद एकमात्र जगह है
जहाँ अधिकारी नहीं,
स्थायी व्यवस्था नियुक्त होती है।
सरकारें बदलती हैं,
फाइलों के कवर बदलते हैं,
पर भीतर बैठा व्यक्ति नहीं बदलता।
यहाँ लोग ढूँढ-ढूँढ कर लाए जाते हैं—
काबिल इसलिए नहीं कि काम करेंगे,
बल्कि इसलिए कि उनके ज़रिये
नए तब्बू बनाए जा सकें।
जो नियम तोड़ सके,
जो सवाल दबा सके,
जो जनहित को
“प्रक्रिया में है” कहकर रोक सके—
वही यहाँ उपयोगी माना जाता है।
यह खंडवा है जनाब,
यहाँ प्रशासनिक मुलाक़ात भी
अधिकार नहीं, अनुग्रह होती है।
पहले मोबाइल में नाम दर्ज होगा,
फिर अधिकारी तय करेगा—
काम उसके काम का है या नहीं।
हित का हो या अहित का,
निर्णय इच्छा से होगा,
न कि नियम से।
यहाँ 26 जनवरी हो या 15 अगस्त,
तेज़ चिन्हित चेहरे ही सम्मानित होते हैं।
हर साल वही लोग,
वही माला, वही शॉल, वही तस्वीर।
जो बिना स्वार्थ के काम करे,
उसका नाम सूची में नहीं आता।
यह खंडवा है जनाब,
यहाँ कोई कार्य
बिना लाभ के संपन्न नहीं होता।
सेवा भी यहाँ
निवेश बन चुकी है,
और सहयोग—
भविष्य की वसूली।
यहाँ सही होना
सबसे बड़ी भूल है,
और चुप रहना
सबसे सुरक्षित नीति।
जो बोले—उसे समझा दिया जाता है,
जो न समझे—
उसे “अन्यत्र” भेज दिया जाता है।
यह खंडवा है जनाब,
यहाँ स्वीकार वही होता है
जो सवाल न करे,
जो सलामी सही कोण पर ठोके,
जो आईना न दिखाए,
केवल परछाईं बने रहे।
सब कुछ खुलेआम नहीं होता,
पर सबको सब पता होता है।
यहाँ हर गड़बड़ी
परंपरा कहलाती है,
हर चुप्पी को
व्यवस्था कहा जाता है।
यह खंडवा है जनाब—
कोई इसे माने या न माने,
पर
खंडवा इसे रोज़ जीता है।















