वीरान छत से ‘मन बगिया’ तक: लौट आई गौरैया की चहचहाहट
मुकेश काले-आलोक नायक की पहल से संरक्षण बना जनआंदोलन, 600+ अंडों को मिला जीवन

खंडवा। सेवा, सद्भावना और सामाजिक जागरूकता के लिए पहचानी जाने वाली दादाजी की नगरी खंडवा से विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर एक प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है। जहां एक ओर तेजी से घटती गौरैया की संख्या चिंता का विषय बनी हुई है, वहीं शहर के दो नागरिक—मुकेश काले और आलोक नायक—अपने सतत प्रयासों से इस नन्ही चिड़िया की चहचहाहट को वापस लाने में जुटे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, मध्यप्रदेश सहित देशभर में गौरैया की संख्या में पिछले कुछ वर्षों में 60 से 80 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है। पहले घरों की छतों, खिड़कियों और पेड़ों पर आसानी से दिखाई देने वाली गौरैया आज शहरी क्षेत्रों में दुर्लभ होती जा रही है। इसके पीछे शहरीकरण, पेड़ों की कटाई, कंक्रीट के मकानों का विस्तार, घोंसले बनाने के लिए स्थानों की कमी, कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग और प्रदूषण जैसे कारण जिम्मेदार हैं।


इसी चुनौती के बीच दादाजी वार्ड निवासी मुकेश काले पिछले 11 वर्षों से अपनी लगभग 600 वर्गफुट की छत को ‘मन बगिया’ के रूप में विकसित कर चुके हैं। एक समय जहां उनकी छत वीरान थी, आज वहीं 100 से अधिक पौधों, फलदार वृक्षों और हरियाली के बीच गौरैया सहित कई पक्षी अपना बसेरा बना रहे हैं। उन्होंने पक्षियों के लिए दाना-पानी और विशेष फीडर की व्यवस्था की है। उल्लेखनीय है कि उनके परिवार ने अब तक 600 से अधिक गौरैया के अंडों का संरक्षण कर उन्हें सुरक्षित जीवन प्रदान किया है, जो इस दिशा में एक अनूठी उपलब्धि है।
वहीं, समाजसेवी आलोक नायक भी गौरैया संरक्षण को जन-जन तक पहुंचाने में सक्रिय हैं। वे अपने हाथों से लकड़ी के घोंसले (नेस्ट बॉक्स) तैयार कर नागरिकों को उपलब्ध करा रहे हैं, ताकि लोग अपने घरों की छतों और आंगनों में इन्हें लगाकर गौरैया को सुरक्षित आवास दे सकें। उनकी इस पहल से शहर में जनसहभागिता बढ़ी है और लोग संरक्षण के प्रति जागरूक हो रहे हैं।

गौरैया संरक्षण के लिए सरकार द्वारा भी जागरूकता अभियान, नेस्ट बॉक्स लगाने के लिए प्रोत्साहन तथा हरियाली बढ़ाने जैसे प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक आमजन की भागीदारी नहीं होगी, तब तक इस दिशा में अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाएंगे।
ऐसे में खंडवा की ‘मन बगिया’ और आलोक नायक की पहल यह संदेश देती है कि छोटे-छोटे प्रयास भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने घर या बालकनी में घोंसला लगाए, दाना-पानी की व्यवस्था करे और हरियाली बढ़ाए, तो गौरैया के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया जा सकता है।
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गौरैया केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरणीय संतुलन का संकेत है। इसे बचाना हम सभी की जिम्मेदारी है।
आइए संकल्प लें—अपने घर की छत को भी ‘मन बगिया’ बनाएं और गौरैया की चहचहाहट को फिर से लौटाएं।















