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विशेष रिपोर्ट सुशील विधाणी |
नगर निगम की नाक इतनी ऊँची हो चुकी है कि उसके ठीक नीचे हो रही अवैध खुदाई भी दिखाई नहीं देती — या फिर नियमों पर आँख मूँदना अब शहरी विकास का नया मॉडल बन चुका है।
डॉक्टर दिलीप जैन हॉस्पिटल के पीछे, भैरव तलाव वार्ड में मि. खैराज लालवानी के प्लॉट पर बेसमेंट की खुदाई धड़ल्ले से जारी थी। काग़ज़ों में इसे Residential यानी आवासीय निर्माण बताया गया और निगम में आवेदन भी किया गया, लेकिन सच्चाई यह है कि परमिशन आज तक जारी नहीं हुई। आवेदन पेंडिंग था, पर ज़मीन पर मशीनें बेखौफ चलती रहीं।
इसी अवैध खुदाई का नतीजा सामने आने में ज़्यादा वक्त नहीं लगा। पास स्थित चावला मेडिकल होलसेल (मनजीत चावला) की तीन मंज़िला इमारत ताश के पत्तों की तरह भरभराकर गिर गई।
संयोग ही कहा जाएगा कि कोई जनहानि नहीं हुई, वरना प्रशासन के पास “जाँच बैठा दी जाएगी” वाला रटा-रटाया बयान पहले से तैयार रहता।
शहर में गिर रही इस बिल्डिंग ने यह बात साफ कर दी कि जब नियम फाइलों में सोते हैं और निगरानी कुर्सियों पर आराम करती है, तब इमारतें मजबूती से नहीं, समझौते से खड़ी होती हैं।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि इमारत क्यों गिरी —
सवाल यह है कि नगर निगम की नाक के नीचे बिना परमिशन यह निर्माण कैसे चलता रहा?
कुछ दिन पहले ही नगर निगम कर्मचारियों से समीक्षा बैठक में सवाल पूछे गए थे, तो कर्मचारी एसडीएम के खिलाफ मैदान में उतर आए। तर्क दिया गया कि अधिकारी उन्हें भ्रष्ट साबित करना चाहते हैं।
तो अब यह मामला क्या कहता है?
क्या यह खुदाई हवा में चल रही थी?
या फिर निगम के किसी अधिकारी की शय के बिना यह सब संभव हो ही नहीं सकता?
जब नियमों को तहखाने में दफ़न कर दिया जाए,
तो ऊपर खड़ी इमारतें देर-सबेर गिरती ही हैं।
यहाँ ज़रूरत सिर्फ नोटिस जारी करने की नहीं है।
निर्माण एजेंसी और प्लॉट मालिक के विरुद्ध कठोर कार्रवाई
बिना अनुमति निर्माण संभव कराने वाले अधिकारी/कर्मचारी की जाँच
और दोष सिद्ध होने पर तत्काल बर्खास्तगी
क्योंकि ताश के पत्ते तो ईमानदार होते हैं —
जो गिरते हैं, साफ़ दिखते हैं।
यहाँ तो गिरावट के बाद भी
जवाबदेही खड़ी रहने का अभिनय कर रही है।
— चल रही है चर्चा















