क्या खंडवा जिले में बाल कल्याण समिति सक्रिय है, या फिर बच्चों से जुड़े हर मामले का रास्ता सीधा थाने तक ही जाता है?
“कक्षा में संस्कार पढ़ाए जा रहे थे, बाहर भीड़ उनका अर्थ समझा रही थी।”
बच्चों का विवाद था, लेकिन प्रदर्शन बड़ों का निकला।
चर्चा न्यूज़ सुशील विधाणी
खंडवा जिले के खारकला गांव स्थित सांदीपनी स्कूल में 12वीं और 9वीं कक्षा के छात्रों के बीच हुआ आपसी विवाद अब केवल स्कूल की घटना नहीं रह गया है, बल्कि संस्कार, समझ और बाल संरक्षण व्यवस्था पर गहरा सवाल बन चुका है। छात्रों की मामूली कहासुनी को सुलझाने की बजाय, एक छात्र के परिवार द्वारा 30–35 लोगों के साथ स्कूल परिसर में पहुंचकर जिस तरह मारपीट, हंगामा और दबाव बनाया गया, उसने शिक्षा के मंदिर को अस्थायी तौर पर अखाड़े में बदल दिया।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि 12वीं के छात्रों के बीच हुए विवाद को देखकर बच्चों के मन में किस प्रकार के संस्कार विकसित हो रहे हैं—यह देखने योग्य है। जब बच्चे यह देखते हैं कि विवाद का समाधान बातचीत, अनुशासन या काउंसलिंग से नहीं बल्कि भीड़, डर और दबाव से किया जाता है, तो उनके भीतर संयम नहीं बल्कि आक्रोश और गलत सामाजिक संदेश पनपता है।
घटना के दौरान अन्य छात्रों, शिक्षकों और प्राचार्य के साथ अभद्र व्यवहार भी सामने आया। शिक्षा देने वालों के सम्मान को ठेस पहुँचना इस पूरे घटनाक्रम को और गंभीर बनाता है।
हालात बिगड़ने पर स्कूल प्रबंधन ने सुरक्षा के नाम पर सीधे पुलिस की शरण ली और मामला खालवा थाने तक पहुंच गया। डायल-112 ने मौके पर पहुंचकर स्थिति संभाली, लेकिन यहाँ अपने आप उभरता है—जब मामला नाबालिग बच्चों से जुड़ा था, तब बाल कल्याण समिति (CWC) को क्यों दरकिनार किया गया?
सूचना तंत्र के अनुसार खंडवा जिले की बाल कल्याण समिति को इस पूरे प्रकरण की जानकारी तक नहीं दी गई। यानी बच्चों के हित में कार्य करने वाली न्यायपीठीय संस्था इस गंभीर मामले से अनजान रही। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि स्कूल प्रबंधन और संबंधित तंत्र को शायद यह तक ज्ञात नहीं है कि ऐसे मामलों में बाल कल्याण समिति सहयोगी, सुधारात्मक और समाधानकारी भूमिका निभा सकती है।
30–35 लोगों के साथ स्कूल परिसर में घुसकर उपद्रव करना क्या सिर्फ बच्चों की लड़ाई की श्रेणी में आता है, या फिर इसे संगठित दबाव और गलत संस्कारों का प्रदर्शन माना जाना चाहिए—यह तय करना अब व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
खारकला गांव के सांदीपनी स्कूल की यह घटना जिलेभर में चर्चा का विषय बनी हुई है। सवाल यही है—
क्या हम बच्चों को समाधान का रास्ता दिखा रहे हैं,
या फिर उन्हें सिखा रहे हैं कि ताकत और भीड़ ही अंतिम उत्तर है?
इन्हीं सवालों के साथ यह पूरा मामला
…चल रही चर्चा।















