भ्रष्टाचार पर पर्दा, सेटिंग का धंधा
खंडवा महिला बाल विकास की सच्चाई
खंडवा महिला बाल विकास की ‘सेटिंग’ कथा”

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चर्चा न्यूज़ विशेष
खंडवा में इन दिनों प्रशासन नहीं, बल्कि “सेटिंग तंत्र” अपने चरम पर है। महिला बाल विकास जैसा संवेदनशील विभाग कागज़ों में उत्कृष्ट और ज़मीनी हकीकत में अस्त-व्यस्त नजर आता है। साल में दो बार होने वाली कार्रवाई अब परंपरा बन चुकी है—जैसे कोई लोकगीत, जो हर बार गाया जाता है, पर उसका असर कहीं दिखाई नहीं देता।
यहां की “मैडम संस्कृति” भी कम दिलचस्प नहीं है। जिम्मेदारी तय है, पर जवाबदेही रास्ते में ही कहीं खो जाती है। प्रशासन से नाराजगी हो तो सुधार की जगह नया तरीका अपनाया जाता है—सोशल मीडिया पर सक्रिय रहो, फॉलोअर्स बढ़ाओ और जमीनी सवालों को लाइक्स और शेयर में दबा दो।
फॉलोअर्स लाखों में, लेकिन काम का हिसाब शून्य के आसपास—यही यहां का नया गणित है।
अब इस “सेटिंग तंत्र” की असली तस्वीर देखिए—
जहां नियम कहते हैं कि लोकायुक्त में पकड़ा गया संविदा कर्मी तत्काल कार्यमुक्त होगा, वहीं खंडवा में नियमों को मानो विश्राम दे दिया गया है। जिन पर वसूली के गंभीर आरोप लगे, जिनकी शिकायत एसडीएम तक पहुंची—उन्हें हटाने के बजाय संरक्षण दिया गया।
पहले सुपरवाइजर को सीडीपीओ का चार्ज देकर “प्रमोशन” की नई परिभाषा गढ़ी गई, और जब लोकायुक्त की कार्रवाई भी हो गई, तब भी कार्यमुक्त करने के बजाय उसी व्यक्ति को जिले में “वसूली अधिकारी” बनाकर सक्रिय कर दिया गया।
मानो संदेश साफ है—यहां योग्यता नहीं, ‘सेटिंग’ ही असली पहचान है।
यहीं नहीं, कुछ महीने पहले खालवा क्षेत्र में 16 आंगनबाड़ी केंद्र बंद पाए जाने की गंभीर रिपोर्ट बनी। जवाब तलब हुआ, निलंबन भी कर दिया गया—पर कार्रवाई की फाइल आज तक टेबल पर ही पड़ी है, जैसे उसे भी किसी “सेटिंग” का इंतजार हो। उस समय विभाग को कर्मचारियों की कोई कमी महसूस नहीं हुई।
लेकिन जैसे ही लोकायुक्त में पकड़ा गया संविदा कर्मी सामने आया, अचानक “कर्मचारियों की कमी” का तर्क जीवित हो गया। नियमों को दरकिनार कर उसे अटैच कर फिर से कार्य लेने की मजबूरी बताई जाने लगी।
यह विरोधाभास नहीं, बल्कि खंडवा की प्रशासनिक कार्यशैली का जीवंत उदाहरण है—जहां परिस्थिति के अनुसार नियम बदल जाते हैं।
और इस पूरी कहानी में एक और दिलचस्प पहलू है—
विभाग का प्रभार चाहे मंत्री के करीबी होने का क्यों न हो, मानो यही सोच हावी है कि जैसा चाहें वैसा जिले को चलाया जा सकता है। नियम, प्रक्रिया और जवाबदेही सब कुछ इस “करीबी व्यवस्था” के आगे बौने नजर आते हैं।
सूत्र बताते हैं कि एडीपीओ रोज लगभग एक घंटा विभाग में ब्रीफिंग देने पहुंचती हैं, और अब सारी चालें उनके अनुभव के अनुसार बिछाई जा रही हैं। बाल संप्रेषण गृह का चार्ज होने के कारण उनका प्रभाव और भी मजबूत माना जा रहा है—यानी फैसले अब फाइलों से कम और “अनुभव आधारित सेटिंग” से ज्यादा संचालित हो रहे हैं।
और अब व्यवस्था का एक और अनोखा नमूना—
जिन मामलों में जांच का दायित्व डीपीओ स्तर पर होना चाहिए, वहां महिला बाल विकास विभाग को किनारे कर सामाजिक न्याय विभाग के अधिकारी को जांच अधिकारी बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। सवाल यह उठता है कि जिस विभाग का कार्य है, उसी को अनुभव नहीं माना जा रहा, और दूसरे विभाग के अधिकारी को अधिक योग्य समझा जा रहा है?
यह केवल जिम्मेदारी का स्थानांतरण नहीं, बल्कि जवाबदेही से बचने की एक नई प्रशासनिक शैली प्रतीत होती है।
यहां संकल्प भी बड़े-बड़े लिए जाते हैं—“सबको लाइन में खड़ा करेंगे।”
लेकिन हकीकत यह है कि लाइन लगती है, काम के लिए नहीं, बल्कि इंतजार और समझौते के लिए। बैठकों का दौर चलता रहता है, और हर बैठक के बाद अगली बैठक की तैयारी हो जाती है—समाधान वहीं का वहीं रह जाता है।
इस पूरे तंत्र में अगर कोई सबसे ज्यादा मजबूत है, तो वह है “स्वार्थ”।
यहां सिद्धांत साफ है—
“गलत को सही साबित करो, और सही को किनारे करो।”
पर सच्चाई यह है कि व्यवस्था फाइलों से नहीं, मैदान से चलती है। जब तक कुर्सी से उतरकर हकीकत नहीं देखी जाएगी, तब तक हर रिपोर्ट “संतोषजनक” ही दिखाई देगी—चाहे ज़मीनी स्थिति कितनी भी चिंताजनक क्यों न हो।
अंत में खंडवा की स्थिति पर वही पुरानी कहावत एक बार फिर सटीक बैठती है—
“अंधेर नगरी, चौपट राजा,
मिल-बांट कर खा रहे ताजा।”
अब सवाल यह नहीं कि क्या हो रहा है—
सवाल यह है कि यह कब तक चलता रहेगा, और इसे बदलने की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?
चल रही है चर्चा……















