ज्योतिर्लिंग नगरी ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग में ‘नर सेवा’ का नारा या व्यवस्था की विफलता?
ओंकारेश्वर/
तीर्थ और आस्था की प्रतीक ओंकारेश्वर नगरी एक बार फिर प्रशासनिक सवालों के घेरे में है। नगर परिसर में वृद्ध आश्रम के नाम पर संचालित भवनों और शासकीय परिसरों के निजी संस्थाओं को आवंटन को लेकर पहले भी विवाद उठ चुके हैं। जनप्रतिनिधियों द्वारा यह आशंका जताई जाती रही है कि नगर के बड़े हिस्से को विभागों या संस्थाओं को सौंप देने से भविष्य के विकास कार्य प्रभावित हो सकते हैं।

अब हालिया वायरल वीडियो ने इस बहस को और तीखा बना दिया है। वीडियो में एक वृद्ध का शव कपड़ों की चादर में लपेटकर नगर परिषद की कचरा गाड़ी से ले जाया जा रहा है। यह दृश्य केवल एक घटना नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की संवेदनहीनता का प्रतीक बन गया है।
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वृद्ध आश्रम या केवल नाम का बोर्ड?
नगर में कई शासकीय भवन विभिन्न संस्थाओं के नाम पर “अलॉट” बताए जाते हैं। कहीं वृद्ध आश्रम, कहीं आश्रय गृह, तो कहीं सामाजिक सेवा संस्था का बोर्ड लगा है—लेकिन जमीनी स्तर पर गतिविधियाँ कितनी हैं, यह स्पष्ट नहीं।
पहले भी सवाल उठे थे कि कुछ परिसरों में वृद्ध आश्रम के नाम पर भवन आवंटित हैं, पर वहां मान्यता, नियमित संचालन और सुविधाओं का अभाव दिखाई देता है।
अब प्रश्न और गहरे हो गए हैं—
यदि संबंधित आश्रम विधिवत पंजीकृत था, तो मृत्यु के बाद वैधानिक प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई?
संचालक की जिम्मेदारी कहाँ थी?
सामाजिक न्याय विभाग द्वारा समय-समय पर निरीक्षण किए जाते हैं या नहीं?
क्या वहां रह रहे वृद्धजनों को शासन की योजनाओं का लाभ मिल रहा है?
शासकीय परिसरों का उपयोग या दुरुपयोग?
सबसे गंभीर सवाल यह है कि ऐसी कितनी बिल्डिंगें हैं जो संस्थाओं के नाम पर केवल कागजों में सक्रिय हैं?
क्या आवंटन के बाद वार्षिक समीक्षा होती है?
क्या उपयोगिता प्रमाणित की जाती है?
जिन उद्देश्यों से भवन दिए गए, क्या वे पूरे हो रहे हैं?
यदि भवन केवल नाम के सहारे घिरे हैं और वास्तविक सेवा कार्य नगण्य है, तो यह शासकीय संपत्ति के दुरुपयोग की श्रेणी में आ सकता है।
योजना कागज पर, ज़मीन पर कचरा गाड़ी?

शासन द्वारा अंतिम संस्कार हेतु rs 5000 की सहायता उपलब्ध कराई जाती है। नगर परिषद समय पर राशि निर्गत होने का दावा करती है। लेकिन जब अंतिम यात्रा कचरा गाड़ी से हो रही हो, तो यह राशि और व्यवस्था कहाँ दिखाई देती है?
लाखों श्रद्धालुओं की आवाजाही वाली इस तीर्थ नगरी में शावाहिनी (शव वाहन) जैसी मूलभूत सुविधा का अभाव होना आश्चर्यजनक है। नगर परिषद राजस्व और टैक्स वसूलती है, फिर भी सम्मानजनक अंतिम संस्कार की व्यवस्था सुनिश्चित नहीं कर पाती—यह सवाल आमजन के मन में गूंज रहा है।
मानव गरिमा का प्रश्न
“नर सेवा नारायण सेवा” का नारा तभी सार्थक है जब सेवा अंतिम क्षण तक सम्मान के साथ हो। कचरा गाड़ी में शव ले जाना न केवल प्रशासनिक चूक है, बल्कि मानवीय गरिमा के साथ समझौता भी है।
अब मांग उठ रही है कि:
सभी आवंटित शासकीय परिसरों की सूची सार्वजनिक की जाए।
संचालित संस्थाओं की मान्यता और निरीक्षण रिपोर्ट सामने लाई जाए।
शावाहिनी की स्थायी व्यवस्था की जाए।
और इस प्रकरण पर मानवाधिकार आयोग संज्ञान लेकर जवाबदेही तय करे।
ओंकारेश्वर केवल एक नगर नहीं, आस्था का केंद्र है। यहां सेवा दीवारों पर लिखे नारों से नहीं, जमीनी व्यवस्था से सिद्ध होनी चाहिए। यदि “नर सेवा” सच में ध्येय है, तो व्यवस्था को भी उसी संवेदनशीलता और जिम्मेदारी से कार्य करना होगा—वरना कचरा गाड़ी में जाती अंतिम यात्रा, पूरे तंत्र पर प्रश्नचिह्न बनकर खड़ी रहेगी।















