खंडवा की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे हैं, जिनके आरोप चुनाव हारने के बाद और तेज़ हो जाते हैं।
लेकिन समस्या यह है कि हर आरोप अदालत की चौखट पर पहुंचते-पहुंचते कागज़ों में दम तोड़ देता है।
कुंदन मालवीय की चुनाव याचिका में पेश एक और आवेदन हाई कोर्ट ने किया खारिज
चर्चा न्यूज़ विशेष सुशील विधाणी
खंडवा में “पंजा नाथ” और स्वयंभू “मिनी कमलनाथ” के नाम से चर्चित कांग्रेस नेता कुंदन मालवीय को हाई कोर्ट से एक बार फिर ऐसा झटका लगा है, जिसे राजनीतिक भाषा में “करारा, ठंडा और रिकॉर्ड में दर्ज” कहा जा सकता है। चुनाव हारने के बाद भाजपा विधायक श्रीमती कंचन मुकेश तंवे पर लगातार लगाए जा रहे फर्जी दस्तावेजों के आरोपों को अदालत ने इस बार भी ज़मीनी हकीकत में बदलने से इंकार कर दिया।
कुंदन मालवीय ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 14 के तहत आवेदन क्रमांक 25055/2025 दायर कर खंडवा कलेक्टर कार्यालय से जुड़े कुछ दस्तावेज रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति मांगी थी। तर्क यह था कि RTI में “कुछ नहीं मिला”, इसलिए वही “कुछ नहीं” अब अदालत में “सब कुछ” साबित करेगा।
“कुछ नहीं मिला” से “सबूत मिल जाएगा” तक का सफर
इस पूरे मामले पर खंडवा जिला मंत्री धर्मेंद्र बजाज ने बताया कि बार-बार आवेदन लाकर चुनावी हार को अदालत में पलटने की कोशिश की जा रही है, लेकिन कानून भावनाओं से नहीं, तथ्यों से चलता है।
उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि जब जानकारी एक साल पहले से उपलब्ध थी, तब चुप्पी और अब अचानक जागृति—यह राजनीति हो सकती है, न्याय नहीं।
मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए विधायक पति श्री मुकेश तंवे ने बताया कि माननीय न्यायालय पर उन्हें पूर्ण विश्वास है। उन्होंने कहा कि कुंदन मालवीय द्वारा लगाए गए झूठे आवेदनों को न्यायालय द्वारा निरस्त किया जाना ही सच्चाई का प्रमाण है।
संक्षिप्त करते हुए उन्होंने कहा— “आवेदनों की गिनती से नहीं, तथ्यों के वजन से फैसला होता है।”
उन्होंने विश्वास जताया कि आगे भी न्यायालय कानून और सच्चाई के आधार पर ही निर्णय देगा।
विधायक का जवाब और अदालत की सीधी बात
भाजपा विधायक श्रीमती कंचन तंवे की ओर से उनके अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता का साक्ष्य 20 अगस्त 2025 को ही समाप्त हो चुका है। अब नए दस्तावेज लाने की कोशिश दरअसल उस दीवार पर प्लास्टर लगाने जैसी है, जिसकी नींव ही कमजोर हो।
अधिवक्ता ने साफ कहा कि 31 जनवरी 2024 से जानकारी याचिकाकर्ता के पास थी, फिर भी उसे रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया। अब समय निकल जाने के बाद “अचानक दस्तावेज प्रेम” समझ से परे है।
हाई कोर्ट का साफ संदेश: अदालत कोई मंच नहीं
माननीय उच्च न्यायालय ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि जिन दस्तावेजों पर मुकदमा टिका हो, उन्हें समय पर पेश करना होता है।
जिन कागज़ों पर न प्रतिवादी के हस्ताक्षर हैं, न उन्हें जारी किया गया है, और न ही उन्हें जिरह में साबित किया जा सकता है—वे राजनीतिक बयान हो सकते हैं, कानूनी सबूत नहीं।
लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा यह है कि हर नए आरोप के साथ उम्मीद बढ़ती है, और हर कोर्ट आदेश के साथ वह उम्मीद फाइलों में दब जाती है।
खंडवा की सियासत में संदेश अब साफ है—
चुनाव बैलेट से हार सकते हैं, लेकिन अदालत में जीतने के लिए नारों से ज़्यादा दस्तावेज चाहिए।
चल रही है चर्चा....
















