खुद की ज़मीन पर पसरा अतिक्रमण नहीं दिखता, दूसरों की दुकानों पर चला नगर निगम का बुलडोज़र
गुरु नानक वार्ड 15 में धार्मिक स्थलों के बीच चल रहा ‘स्लाइडर हाउस’, सीएम हेल्पलाइन लेवल-4 तक शिकायतें पहुँचीं—कार्रवाई शून्य, ‘संतुष्टि’ पूर्ण
खंडवा नगर निगम की कार्यप्रणाली अब केवल सवालों में नहीं, बल्कि सार्वजनिक उपहास का विषय बनती जा रही है। निगम एक ओर पूरे जिले में अतिक्रमण हटाने के नाम पर सख़्ती दिखाता है, वहीं दूसरी ओर अपनी ही ज़मीन और सार्वजनिक उपयोग की जगहों पर हुए अतिक्रमण उसे दिखाई ही नहीं देते।
धार्मिक स्थलों के बीच नियमों की ‘झटका व्यवस्था’
वार्ड क्रमांक 15, गुरु नानक वार्ड—माखन स्कूल के सामने, हनुमान मंदिर के ठीक सामने, अनाथ आश्रम से सटा और जैन स्थानक से महज़ दस कदम की दूरी पर—सड़क पर खुलेआम “स्लाइडर हाउस” संचालित है। झटका मटन का यह अवैध संचालन न केवल नियमों के खिलाफ है, बल्कि धार्मिक आस्था और स्वच्छता दोनों को चुनौती दे रहा है।
स्थानीय नागरिकों द्वारा नगर निगम, एसडीएम, कलेक्टर जनसुनवाई और अंततः सीएम हेल्पलाइन लेवल-4 तक शिकायतें की गईं, लेकिन न दुकान हटी, न संचालन रुका। हर बार काग़ज़ी निराकरण कर शिकायत को “संतोषजनक” बताकर बंद कर दिया गया।

लेडिस बाथरूम का रास्ता बंद, शिकायतें खुली की खुली
इसी तरह का एक और गंभीर मामला यातायात थाने के पास स्थित सार्वजनिक बाथरूम परिसर का है। यहां लेडिस बाथरूम के रास्ते को ताला लगाकर बंद कर दिया गया है। रास्ते पर अतिक्रमण कर संचालन किया जा रहा है, जिससे महिलाओं को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।
चौंकाने वाली बात यह है कि इस अतिक्रमण की भी कई बार लिखित और मौखिक शिकायतें की जा चुकी हैं, लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। स्थानीय लोगों का आरोप है कि राजनीतिक संरक्षण के चलते यह अतिक्रमण यथावत है।
RS-7000 मंथली किराया और जनहित की बलि
सूत्रों के अनुसार, इस अतिक्रमण से करीब RS-7000 मासिक किराया वसूला जा रहा है। सवाल यह है कि यह राशि किसकी जेब में जा रही है?
क्या यही कारण है कि जनहित, महिलाओं की सुविधा और सार्वजनिक स्वच्छता को नजरअंदाज किया जा रहा है?

नागरिकों का तर्क साफ है—
जब सार्वजनिक बाथरूम महिलाओं के लिए बना है, तो उसका रास्ता बंद कर अतिक्रमण कैसे जायज़ हो सकता है?
और अगर शिकायतों के बाद भी कब्ज़ा नहीं हट रहा, तो क्या यह मान लिया जाए कि संरक्षण ऊपर तक है?
दोहरी नीति या संरक्षित अतिक्रमण?
एक ओर नगर निगम छोटे दुकानदारों और ठेले वालों पर कार्रवाई कर अपनी सख़्ती का प्रदर्शन करता है, दूसरी ओर
धार्मिक स्थलों के सामने अवैध व्यवसाय,
सार्वजनिक बाथरूम के रास्ते पर ताला,
और निगम की ही जमीन पर वर्षों से जमे अतिक्रमण—
इन सब पर चुप्पी साध लेता है।
जनता पूछ रही है
क्या सीएम हेल्पलाइन केवल शिकायतें थकाने की व्यवस्था बनकर रह गई है?
क्या नगर निगम के लिए जनहित से ज़्यादा किराया और संरक्षण महत्वपूर्ण है?
महिलाओं की सुविधा से बड़ा आखिर कौन सा हित है?
यह खबर केवल अतिक्रमण की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की पोल है जहाँ
कार्रवाई फाइलों में होती है,
संरक्षण जमीन पर दिखता है,
और जनता हर बार सवाल लेकर खाली हाथ लौटती है।















