चर्चा न्यूज़ 
खंडवा में जमीन विवाद अब सिर्फ राजस्व का मामला नहीं रहा,
यह धैर्य, हिम्मत और ऊँचाई की परीक्षा बन चुका है।
यहाँ न्याय पाने के लिए
ना तो तहसील का रास्ता कारगर है,
ना एसडीएम कार्यालय का,
बल्कि लगता है कि हाई टेंशन लाइन का टावर ही अंतिम अपीलीय मंच बन गया है।
किसान रोहित पाल की कहानी बताती है कि
अगर आप जमीन पर खड़े रहकर न्याय माँगेंगे
तो फाइलें आपकी फाइल बन जाएँगी,
लेकिन जैसे ही आप टावर पर चढ़ेंगे—
पूरा प्रशासन हरकत में आ जाएगा,
मगर सिर्फ उतारने तक, समाधान तक नहीं।
खंडवा प्रशासन ने शायद यह मान लिया है कि
न्याय एक आपातकालीन सेवा है,
जो केवल तब चालू होती है
जब कोई नागरिक अपनी जान दांव पर लगा दे।
आज किसान टावर पर है,
कल शायद कोई पुल पर होगा,
परसों कोई जलसमाधि की चेतावनी देगा—
और प्रशासन हर बार यही कहेगा:
“स्थिति नियंत्रण में है।”
सबसे दिलचस्प बात यह है कि
जमीन वहीं है,
कागज़ वहीं हैं,
पटवारी, तहसीलदार, एसडीएम—सब मौजूद हैं,
फिर भी नापती आज तक नहीं हो पाई।
शायद प्रशासन उस दिन का इंतज़ार कर रहा है
जब जमीन खुद चलकर कार्यालय पहुँचे।
राजनीतिक रसूख का सवाल उठता है,
तो जवाब मिलता है—जांच करेंगे,
किसान जान जोखिम में डालता है,
तो जवाब मिलता है—समझाइश दी गई।
यह भी संभव है कि आने वाले समय में
खंडवा जिले में
न्याय की पात्रता कुछ इस तरह तय हो—
जिसने एक बार टावर चढ़ा, उसकी फाइल खुलेगी
जिसने दो बार चढ़ा, उसकी नापती होगी
और जिसने तीसरी बार चढ़ा,
शायद उसे न्याय मिल भी जाए… शायद।
फिलहाल,
किसान टावर पर है,
प्रशासन बयान में है,
और सिस्टम उसी पुराने भरोसे पर टिका है—
कि थोड़ा समय और निकल जाएगा।
लेकिन सवाल यह नहीं है कि
रोहित पाल कब नीचे उतरेगा,
सवाल यह है कि
प्रशासन कब जमीन पर उतरेगा?
जब तक प्रशासन जमीन पर नहीं उतरता,
तब तक खंडवा में
हर टावर पर चढ़ता किसान
सिस्टम की असफलता का
जिंदा पोस्टर बना रहेगा।
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