चर्चा न्यूज़ विशेष….


(सुशील विधाणी)
शीर्षक: मेहनत गई छुट्टी पर, योजना जी आई घर-घर!
देश बड़ा प्रगतिशील हो गया है—अब पसीना बहाना पुरानी बात हो गई, और बैंक खाते में पैसा आना “अधिकार” बन गया है। मेहनत करने वाले आज भी खेत-खलिहान में झुलस रहे हैं, और बिना कुछ किए खाते में रकम आने वाले “समाज के नए प्रेरणास्त्रोत” बन चुके हैं।
सरकार की योजनाएँ इतनी दयालु हो गई हैं कि अब लगता है “काम” शब्द को ही संग्रहालय में रख देना चाहिए। आखिर जब RS 1 किलो अनाज मिल रहा है और हर महीने खाते में सहायता राशि आ रही है, तो भला कौन सुबह उठकर मेहनत करने की गलती करेगा?
पहले लोग कहते थे – “मेहनत का फल मीठा होता है।”
अब जमाना कहता है – “योजना का पैसा सीधा होता है!”
गाँव के चौपाल से लेकर शहर की गलियों तक एक नई सोच विकसित हो रही है—
“काम क्यों करें, जब सरकार है ना!”
किसान खेत में कम, और योजना की सूची में ज़्यादा दिखाई दे रहा है। मजदूर अब मजदूरी से ज्यादा फॉर्म भरने में माहिर हो चुका है।
विडंबना देखिए, जो वास्तव में जरूरतमंद हैं, वे लाइन में खड़े-खड़े थक जाते हैं, और जो “जुगाड़ू” हैं, उनके खाते में योजनाएँ स्वतः प्रवाहित होती रहती हैं। मानो मेहनत करने वाले मूर्खों की सूची में आ गए हों और आराम करने वाले “स्मार्ट नागरिक” बन गए हों।
और अब तो समाजसेवा भी नए दौर में प्रवेश कर चुकी है—
आज के कई समाजसेवी केवल “पद” के नाम के रह गए हैं। सेवा कम, पद की दौड़ ज्यादा है। प्रशासन की फाइलों तक सीमित समाजसेवा, आयोग तक पहुँचने की सीढ़ी बन गई है। वहाँ पहुँचकर भी सेवा का जज़्बा नहीं, बल्कि वेतन और सुविधा ही उद्देश्य बनता दिख रहा है।
यह आज का युग है—जहाँ केवल “अप्रोच” के बल पर, योग्यता के बिना भी पद हासिल कर लिया जाता है, और फिर पूरे अधिकार से शासन का वेतन भी ग्रहण किया जाता है। मानो काबिलियत नहीं, संपर्क ही नई डिग्री बन गई हो।
हाँ, विधवा पेंशन या वास्तविक जरूरतमंदों को सहायता मिलना एक अलग और आवश्यक विषय है—उस पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। परंतु चिंता तब होती है, जब हर तरफ पात्रता और योग्यता का महत्व ही धुंधला पड़ने लगे, और सहायता का दायरा जरूरत से ज्यादा “आदत” बन जाए।
क्या सच में हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ आत्मनिर्भरता की जगह “सरकारी निर्भरता” ही नई उपलब्धि होगी?
जहाँ हाथ में औजार की जगह मोबाइल और योजना की सूचना होगी?
सवाल यह नहीं कि सहायता दी जाए या नहीं—
सवाल यह है कि क्या सहायता “सहारा” बन रही है या “आलस का आधार”?
कहीं ऐसा न हो कि आने वाली पीढ़ियाँ इतिहास में पढ़ें—
“एक समय था जब लोग काम करके खाते थे… फिर योजनाएँ आईं और आदतें बदल गईं।”
सोचिए…
क्या हम सच में विकास कर रहे हैं,
या सिर्फ सुविधा की चादर में जिम्मेदारी को ढक रहे हैं?















