जहाँ हँसी के बीच सिस्टम समझ आया और अंत में चर्चा सिर्फ़ अनुभव की चर्चा पर ही आकर ठहरी।

1500 में सिपाही से Rs.3000 में थानेदार
खंडवा पुलिस की वर्दी का असली कंट्रोल रूम
जिस वर्दी से चोर, बदमाश और फ्रॉड कांपते हैं,
उसी वर्दी में अनुशासन की लकीरें झांकती हैं।
रैंक सिर्फ स्टारों की गिनती नहीं जनाब,
यह ज़िम्मेदारी का वजन है, जो कंधों पर उतरती है।
गलत एंगल, गलत बैज—तो पहचान भी गलत,
सही वर्दी में ही अत्याचार से लड़ने की ताकत।
कानून का रुतबा कपड़े से नहीं बनता,
पर नियम से पहनी वर्दी ही उसका मतलब बताती है।
चर्चा न्यूज़ विशेष
खंडवा में पुलिस प्रशासन का इकलौता कंट्रोल रूम भले ही सिटी कोतवाली के पास हो, लेकिन वर्दी का असली कंट्रोल तो ठीक उसके बाहर बैठा 40 साल पुराना पुलिस यादव टेलर संभाल रहा है। यहाँ वर्दी सिर्फ सिली नहीं जाती, यहाँ रैंक की सच्चाई परखी जाती है।
यादव टेलर पूरे आत्मविश्वास के साथ बताते हैं
“सिर्फ वर्दी नहीं साहब, एसेसरी का पूरा अनुभव हमें है। जॉइनिंग के साथ किस पोस्ट पर कौन-सी पट्टी लगेगी, कितने स्टार होंगे, कौन-सा बैज और किस नियम से—यह सब हमारी सुई-धागे की समझ में है।”
उनका दावा है कि नकली वर्दीधारी पकड़ना उनके लिए सबसे आसान काम है।
“गलत स्टार, गलत एसेसरी या ज़रा-सी चूक… और नकली खुद सामने आ जाता है। कई बार ऐसे लोग भी आए, जिन्हें लगा वर्दी पहन ली तो अफसर बन गए, लेकिन हमने उन्हें आसानी से पहचानकर सही जगह पहुँचा दिया।”
इसके बाद आता है वर्दी का सबसे चर्चित हिस्सा—रेट लिस्ट।
यहाँ गणित बिल्कुल साफ है—
Rs.1500 में सिपाही,
Rs.2000 में हेड कांस्टेबल,
Rs.2500 में SI,एस आई
और Rs.3000 में थानेदार।
यह कीमत कपड़े की नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, अनुशासन और रुतबे की सिलाई की है।
कहते हैं, जितनी ऊँची पोस्ट, उतनी गहरी सिलाई और उतना ही नपा-तुला कॉलर।
पुलिस कैंपस के बाहर खड़ा यह टेलर अब सिर्फ दर्जी नहीं, बल्कि
अनुशासन, अनुभव और असली-नकली की पहचान का अनौपचारिक जांच केंद्र बन चुका है—
जहाँ सुई-धागे के साथ अनुभव चलता है
और हर गलत स्टार अपने आप गिर जाता है।
खंडवा में अब यह कहावत आम हो चली है—
“थाने की फाइल बाद में देखी जाती है, यादव टेलर की नज़र पहले।”
















