
झूठी सीएम हेल्पलाइन मॉडल
प्रेस वही, तरीका नया — सोशल मीडिया से सिस्टम पर दबाव
चर्चा न्यूज़ | संपादक सुशील विधाणी
खंडवा में सोशल मीडिया के विस्तार के साथ एक नया वर्ग उभरकर सामने आया है—स्वयंभू सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर, मंथली रिचार्ज पत्रकार और यूट्यूब रिपोर्टर। पत्रकारिता की न तो कोई मान्यता, न पंजीकरण—लेकिन मोबाइल कैमरा, 28 दिन का रिचार्ज और सीएम हेल्पलाइन का डर… यही इनका नया औज़ार बन चुका है।
प्रेस वही, तरीका नया
कल तक जो लोग आम नागरिकों के कपड़ों पर प्रेस करते थे, वे आज भी “प्रेस” ही कर रहे हैं।
फर्क बस इतना है कि अब कपड़ों की सिलवटें नहीं, बल्कि अधिकारियों की कुर्सियाँ और विभागीय संतुलन दबाए जा रहे हैं।
“प्रेस वाला हूँ” सुनते ही कई जगह बिना सत्यापन के भीतर तक एंट्री मिल जाती है—और यहीं से भ्रम शुरू होता है।
सच बोलता है, सिस्टम चूक जाता है
जब पूछा जाए—काम क्या है?
तो जवाब आता है—प्रेस।
कहने वाला कपड़ों की प्रेस की बात करता है, सुनने वाला पत्रकारिता समझ बैठता है।
सवाल सीधा है—गलती व्यक्ति की है या सिस्टम की?
सीधा सच, सीधा चंदा
अब विभागों में इशारों की जरूरत नहीं—
“काम तो आज भी प्रेस का ही है,
बस अब प्रेस मशीन के साथ सीएम हेल्पलाइन का बटन जुड़ गया है।
चंदा दीजिए, वरना शिकायत तय है।”
यहीं से झूठी सीएम हेल्पलाइन और फर्जी आवेदनों का खेल शुरू होता है।
जनसुनवाई बना नया मंच
कलेक्टर की जनसुनवाई में विभागीय मुद्दों से ज़्यादा व्यक्तिगत शिकायतें रखी जा रही हैं।
चेहरा दीन-दुखी, भाषा पीड़ित—और कैमरा चालू।
इसके बाद सोशल मीडिया वीडियो के जरिए अधिकारियों पर दबाव का अगला दौर।
सोशल मीडिया का भ्रम
रेल पटरी, गड्ढे और दफ्तरों के बाहर खड़े होकर रिपोर्टिंग करने वाले ये मंथली रिचार्ज पत्रकार असली, पंजीकृत पत्रकारों की साख पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
रिचार्ज खत्म—पत्रकारिता भी खत्म।
चापलूसी से पहचान तक
कुछ चेहरे समय के साथ रूप बदलते गए—
कल तक अतिक्रमण, आज चापलूसी।
बड़े नेताओं के साथ फोटो, पीछे-पीछे वीडियो—और फिर उन्हीं तस्वीरों को ढाल बनाकर विभागों में “वसूली मॉडल” पेश किया जा रहा है।

जब अधिकारी बाहर का रास्ता दिखाता है, तो वहीं से वीडियो बनाकर धमकी शुरू।
अब सिस्टम को कदम उठाने होंगे
खंडवा प्रशासन ने इस प्रवृत्ति को समझना शुरू कर दिया है, लेकिन अब ठोस कार्रवाई जरूरी है—
पंजीकृत पत्रकारों की स्पष्ट और सार्वजनिक सूची
अपंजीकृत सोशल मीडिया प्रभावकों पर कड़ी निगरानी
झूठी सीएम/जुडिशल हेल्पलाइन पर सख्त जांच
असली पत्रकारों की साख और सम्मान की रक्षा
क्योंकि—

जब सिस्टम पहचान करना भूल जाता है,
तो सोशल मीडिया का भ्रम शासन पर भारी पड़ने लगता है।
चर्चा न्यूज़ चल रही है चर्चा…...















