मंच मेडिकल का था, लेकिन बयान सियासी युद्ध का निकला
चर्चा न्यूज़ विशेष
मध्यप्रदेश खंडवा की राजनीति में बयान, विवाद और सत्ता-संतुलन के लिए पहचाने जाने वाले जनजातीय कार्य विभाग के मंत्री डॉ. कुँवर विजय शाह खंडवा में एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गए हैं। अंतरराष्ट्रीय मेडिकल कॉन्फ्रेंस का मंच, सरकारी घोषणाएँ और शैक्षणिक विमर्श — सब अपनी जगह रहा, लेकिन असली संदेश सत्ता, व्यवस्था और मीडिया के बीच खिंची लकीरों को और गहरा कर गया।
सबसे पहले सवाल यही उठा कि अपने ही गृह जिले के मेडिकल कॉलेज में मंत्री को पूरे छह साल बाद बुलाया जाना महज़ संयोग था या सोची-समझी राजनीतिक दूरी। मंच से मंत्री ने इस दूरी को सीधे शब्दों में नहीं कहा, लेकिन उनका मजाकिया लहजा और प्रतीकात्मक बयान बहुत कुछ कह गया।
“डाकिया राजनीति” और सत्ता का संकेत
मेडिकल विद्यार्थियों के लिए बस सुविधा की घोषणा करते हुए मंत्री ने खुद को शासन और संस्थानों के बीच “डाकिया” बताया। राजनीतिक हलकों में इसे सामान्य तुलना नहीं माना जा रहा।
विश्लेषकों के मुताबिक यह एक सीधा संदेश था—
अगर संवाद का डाकिया बुलाया ही नहीं जाएगा, तो सरकार की चिट्ठियाँ वर्षों तक रास्ते में ही अटकी रहेंगी।
यह टिप्पणी केवल व्यवस्था पर नहीं, बल्कि उन अफसरशाही और राजनीतिक परतों पर भी थी, जिनके बीच छह साल तक संवाद ठहरा रहा।
मीडिया से टकराव: दूरी नहीं, रणनीति?
कार्यक्रम में घोषणाओं से ज्यादा चर्चा मंत्री और मीडिया के रिश्तों की रही।
सूत्रों के अनुसार, बीते कुछ समय से मंत्री विजय शाह मीडिया से सुनियोजित दूरी बनाए हुए हैं। सार्वजनिक कार्यक्रमों में अब सीधे संवाद कम और फिल्टर किए गए लिखित बयान ज्यादा नज़र आते हैं, जिन्हें प्रवक्ताओं के जरिए जारी किया जाता है।
सूत्र यह भी बताते हैं कि शासन स्तर पर यह स्पष्ट रणनीति रही है कि मंत्री के बयानों को विस्तार या विश्लेषण के बजाय “सुरक्षित फ्रेम” में ही रखा जाए।
इसके बावजूद मंत्री के शब्द बार-बार उस फ्रेम से बाहर निकल आते हैं — और शायद यही असहजता की असली वजह है।
खंडवा में मंच से निकला यह वाक्य—
“मीडिया तो मेरी दुश्मन है”
अब सिर्फ एक भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं माना जा रहा। राजनीतिक गलियारों में इसे सत्ता और मीडिया के बीच बढ़ते टकराव की औपचारिक स्वीकारोक्ति के रूप में देखा जा रहा है।
बस मिली, लेकिन व्यवस्था पर सवाल गहरे
मेडिकल कॉलेज के डीन द्वारा वर्षों बाद समस्याएँ सीधे शासन तक पहुँचाने की बात कहना और उस पर मंत्री का जवाब—
“आप समस्याएँ हमें सौंप दीजिए, सरकार तक पहुँचाना हमारा काम है”
दरअसल उस चुप्पी की कहानी कह गया, जो सालों तक सिस्टम में पसरी रही।
मंत्री ने जनजातीय विद्यार्थियों के लिए विदेश में मेडिकल पोस्ट ग्रेजुएशन हेतु 40 हजार अमेरिकी डॉलर सहायता योजना का उल्लेख कर सरकार की उपलब्धियाँ भी गिनाईं, लेकिन खंडवा की राजनीति अब उपलब्धियों से आगे बढ़ चुकी है।
अब खंडवा में असली चर्चा ये है—
क्या मंत्री को जानबूझकर अपने ही गृह जिले से दूर रखा गया?
क्या मीडिया से दूरी सत्ता की सोची-समझी रणनीति है या हालात की मजबूरी?
और अगर मीडिया “दुश्मन” है, तो सत्ता को अपने संदेश जनता तक पहुँचाने का रास्ता आखिर बचेगा कहाँ से?
खंडवा में साफ कहा जा रहा है—
बस की घोषणा राहत हो सकती है,
लेकिन मंत्री का लहजा, मीडिया पर टिप्पणी और छह साल की दूरी
इस पर चल रही है चर्चा…















