आश्रय नहीं, आय का ज़रिया: वृद्धाश्रम के नाम पर होटल संस्कृति

चर्चा: भोपाल में बने शासन के वृद्धाश्रमों में होटल जैसी सुविधाएँ, सेवा और शुल्क व्यवस्था पर उठते सवाल
वृद्धजनों के लिए सहारा और संवेदना उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनाए जाने वाले वृद्धाश्रमों की भूमिका हमेशा से सामाजिक सेवा के रूप में देखी जाती रही है। “आश्रम” शब्द अपने आप में नि:शुल्क सहायता और मानवीय देखभाल की भावना को दर्शाता है, लेकिन हाल के समय में कुछ व्यवस्थाओं को लेकर अलग-अलग स्तर पर प्रश्न उठने लगे हैं।
भोपाल में शासन द्वारा स्थापित कुछ वृद्धाश्रमों में उपलब्ध सुविधाएँ आधुनिक और सुव्यवस्थित बताई जाती हैं, जिन्हें कई लोग होटल जैसी सुविधाओं से तुलना कर रहे हैं। चर्चा का विषय यह है कि इन सुविधाओं के बदले बुज़ुर्गों से मासिक शुल्क लिया जा रहा है। ऐसे में यह स्पष्ट होना आवश्यक हो जाता है कि यह शुल्क किन नियमों के तहत लिया जा रहा है और इसकी जानकारी हितग्राहियों को कितनी पारदर्शिता से दी जाती है।
जानकारी के अनुसार, इन संस्थानों को शासन की ओर से भूमि, निर्माण संबंधी अनुमतियाँ तथा CSR के माध्यम से सहयोग भी प्राप्त होता है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि सरकारी सहयोग और निजी शुल्क—दोनों के बीच संतुलन कैसे तय किया गया है और सेवा की मूल भावना किस स्तर तक बनी हुई है।
इसी क्रम में खंडवा (खालवा) क्षेत्र में कुपोषण से जुड़े एक कार्यक्रम के अंतर्गत लगभग 25 लाख रुपये के CSR सहयोग की भी चर्चा सामने आई है। यह राशि किन-किन गतिविधियों में खर्च की गई, इसे लेकर अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यदि CSR राशि का उपयोग प्रतीकात्मक सामग्री जैसे प्रचार से जुड़ी वस्तुओं पर किया गया है, तो उसके प्रभाव और उपयोगिता का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
बताया जाता है कि इस प्रकार की CSR गतिविधियाँ महिलाओं से जुड़े विभागों के माध्यम से संचालित कार्यक्रमों से संबंधित हैं। ऐसे में यह ज़रूरी हो जाता है कि हर वर्ष CSR के अंतर्गत प्राप्त होने वाली राशि, उसके उपयोग और उसके परिणामों की सार्वजनिक समीक्षा हो, ताकि कुपोषण जैसे संवेदनशील विषय पर वास्तविक प्रगति को समझा जा सके।
खंडवा में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति द्वारा निर्मित बड़े और सुविधायुक्त होटल का उदाहरण भी स्थानीय स्तर पर चर्चा में है। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब सुविधाएँ लगभग समान हों, तो सेवा और व्यवसाय के बीच की रेखा को स्पष्ट रखना आवश्यक हो जाता है, ताकि किसी भी प्रकार की गलतफहमी या भ्रम की स्थिति न बने।
आज व्यापक रूप से यह चर्चा सुनने को मिलती है कि कई योजनाओं में प्राथमिकता अब प्रक्रिया और औपचारिकताओं तक सीमित होती जा रही है। जो लोग ज़मीनी स्तर पर सुधार की कोशिश करते हैं, वे भी अक्सर प्रशासनिक जटिलताओं और नियमों की व्याख्या के कारण निराश महसूस करते हैं।
ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि वृद्धाश्रमों, CSR फंड और सामाजिक योजनाओं से जुड़ी व्यवस्थाओं में पूर्ण पारदर्शिता, स्पष्ट दिशा-निर्देश और नियमित निगरानी सुनिश्चित की जाए। इससे न केवल सेवा की भावना बनी रहेगी, बल्कि उन सभी सवालों का समाधान भी हो सकेगा जो आज जनचर्चा का विषय बने हुए हैं।
कांग्रेस नेता प्रतिपक्ष खंडवा
खंडवा नेता प्रतिपक्ष दीपक राठौड़ उर्फ मल्लू ने शासन के वृद्ध आश्रम की अवधारणा पर सवाल उठाते हुए कहा कि जहां समृद्धि और एकता की बातें की जा रही हैं, वहीं परिवार से अलग कर पैसे लेकर रहने की व्यवस्था करना आश्रम नहीं, होटल संस्कृति को बढ़ावा देना है। उन्होंने इसे हिंदू संस्कृति के मूल भाव के विरुद्ध बताया। कांग्रेस ने भी कटाक्ष करते हुए कहा कि सेवा की आड़ में व्यवसाय करना आस्था के साथ छल है।
यह विषय किसी व्यक्ति या संस्था पर सीधा आरोप लगाने का नहीं, बल्कि उन व्यवस्थाओं की समीक्षा का है, जिनका उद्देश्य समाज के सबसे कमजोर वर्ग को सहारा देना है। समय रहते यदि स्पष्टता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाती है, तो सेवा और विश्वास—दोनों को बचाया जा सकता है।
















