खंडवा चर्चा न्यूज़ विशेष

“जल महोत्सव शुरू… प्रचार नहीं, प्रसारण शून्य!”
नववर्ष से पहले आयोजन ‘कंप्लीट’ करने की हड़बड़ी में खबर ही अधूरी रह गई
खंडवा |
हनुवंतिया में जल महोत्सव का शुभारंभ हो चुका है—यह तथ्य अब आधिकारिक प्रचार से नहीं, बल्कि अंदरूनी चर्चाओं और फुसफुसाहटों के जरिए सामने आ रहा है। बताया जा रहा है कि अपर कलेक्टर द्वारा फीता काटकर शुभारंभ भी कर दिया गया, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि न तो मीडिया को सूचना दी गई, न जनप्रतिनिधियों को आमंत्रण मिला और न ही किसी तरह का सार्वजनिक प्रचार-प्रसार किया गया।
चर्चा यह भी है कि जल महोत्सव को बिना प्रचार के शुरू करने के पीछे कोई नई कार्यप्रणाली नहीं, बल्कि नववर्ष की तैयारियों से पहले आयोजन “कंप्लीट” दिखाने की जल्दबाजी रही। तारीख निकल जाए, फाइल में टिक लग जाए और साल खत्म होने से पहले आयोजन कागजों में पूरा मान लिया जाए—भले ही जमीनी स्तर पर माहौल बने या न बने।
मुख्यमंत्री के विजन और हनुवंतिया को वैश्विक पर्यटन स्थल बनाने की बातों के बीच शुभारंभ ऐसा हुआ, मानो कोई गोपनीय प्रशासनिक रस्म निभाई जा रही हो। जिस महोत्सव को पर्यटन, संस्कृति और उत्सव का संगम बताया जा रहा है, उसकी शुरुआत ही अगर चुपचाप हो जाए, तो सवाल उठना लाज़मी है कि यह आयोजन जनता के लिए है या सिर्फ सालाना रिपोर्ट के लिए?
कागजों में 100 दिनों तक चलने वाली रोमांचक गतिविधियों की लंबी सूची मौजूद है—स्पीड बोटिंग से लेकर टेंट सिटी, सांस्कृतिक संध्याओं और गाला नाइट तक। लेकिन जमीनी हकीकत में कई काम अब भी “चल रहे हैं”, “तैयार हो रहे हैं” की अवस्था में बताए जा रहे हैं। यानी महोत्सव शुरू हो गया, पर माहौल अभी निर्माणाधीन है।
लोक कला, स्थानीय कलाकारों और शिल्पकारों को मंच देने की बात जरूर की जा रही है, लेकिन शुरुआत के इस गुपचुप अंदाज ने पारदर्शिता और सहभागिता—दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
फिलहाल हालात यह हैं कि
जल महोत्सव तो शुरू हो गया है,
पर जवाब और भरोसा अभी बाकी है—
और यही चर्चा शहर से लेकर गलियारों तक चल रही है।
जिस हनुवंतिया का प्रचार देश-विदेश तक गूंजा करता था,
जहाँ जल महोत्सव की हर गतिविधि
राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन जाया करती थी।
जिसे “मिनी गोवा” कहकर
पर्यटन के नक्शे पर चमकाया गया,
आज उसी हनुवंतिया की शुरुआत
इतनी खामोश होगी—
यह सोचना भी कभी संभव न था।
जहाँ कभी शोर उत्सव का होता था,
आज वहाँ सन्नाटा औपचारिकताओं का है।
महोत्सव चल रहा है,
पर चर्चा महोत्सव की नहीं—
उस चुप्पी की है,
जिसमें यह सब शुरू किया गया।















