एक तरफ यातायात ड्यूटी, दूसरी तरफ गर्भवती महिला की बेबसी—बीच में अटकी रही रसीद।

खंडवा।
इंदिरा चौक मेगा मॉल क्षेत्र में खंडवा की यातायात व्यवस्था उस समय सवालों के घेरे में आ गई, जब ट्रैफिक जवान यातायात के कार्य में व्यस्त रहा और एक परिवार—जिसमें गर्भवती महिला और बच्चे शामिल थे—करीब एक घंटे से अधिक समय तक आगे-पीछे घूमता रहा।

बाहर से आए इस परिवार ने उस स्थान पर वाहन खड़ा किया, जहां नो पार्किंग का कोई बोर्ड मौजूद नहीं था। कुछ ही देर में गाड़ी पर विल लॉक लगा दिया गया। परिवार ने बार-बार निवेदन किया कि महिला गर्भवती है, डॉक्टर के पास अपॉइंटमेंट है—रसीद बना दीजिए, जुर्माना ले लीजिए और जाने दीजिए।
लेकिन ट्रैफिक जवान का जवाब साफ था—
“रसीद नहीं बनेगी, अधिकारी आएंगे तभी लॉक खुलेगा।”
इस बीच जवान यातायात के संचालन में व्यस्त रहा, वहीं परिवार—महिला, बच्चे और परिजन—धूप में शहर का चक्कर लगाते रहे। मौके पर मौजूद लोगों ने वरिष्ठ अधिकारियों को फोन कर स्थिति से अवगत कराया, फिर भी राहत नहीं मिली।
विडंबना यह रही कि गाड़ी मालिक लगातार कहता रहा—
“मैं एक घंटे से कह रहा हूं, रसीद बना लो, लेकिन न रसीद बन रही है, न हमें जाने दिया जा रहा है।”
करीब एक घंटे बाद ट्रैफिक थाने से वानखेड़े साहब मौके पर पहुंचे। परिवार की स्थिति देखते ही उन्होंने ट्रैफिक जवान को गाड़ी छोड़ने के निर्देश दे दिए—बिना रसीद, बिना चालान, बिना जवाबदेही।
यह घटना बताती है कि खंडवा में
नियम पहले परेशान करते हैं,
और समाधान देखकर आता है।
जब अंत में गाड़ी बिना रसीद छोड़ी ही जानी थी, तो सवाल यही है—
क्या एक गर्भवती महिला को एक घंटे तक घुमाना भी यातायात व्यवस्था का हिस्सा है?
यही है खंडवा की पार्किंग व्यवस्था—
जहां बोर्ड नहीं होते, नियम दिखते नहीं,
और इंसानियत अक्सर विल लॉक में फंसी रह जाती है।
अब यह मामला शहर में चर्चा का विषय है—और यही है चर्चा न्यूज़ की चर्चा।















