कुर्सी के पास बैठा सुपरवाइज़र ही बना बैठा ‘परियोजना अधिकारी’

खंडवा | चर्चा न्यूज़
महिला एवं बाल विकास विभाग इन दिनों किसी सरकारी विभाग से कम और साहित्य से ज़्यादा मेल खाता दिखाई दे रहा है। यहाँ प्रशासन नहीं चलता, बल्कि एक अलिखित फार्मूला लागू है—
“जाँच चलती रहे, एफआईआर दर्ज होती रहे, लेकिन कुर्सी कभी खाली न रहे।”
यही वजह है कि परियोजना अधिकारी के निलंबन के बाद तय सुपरवाइज़र ने न सिर्फ परियोजना संभाली, बल्कि ग्रामीण अंचलों से लेकर कार्यालयी गलियारों तक खुद को परियोजना अधिकारी के रूप में स्थापित भी कर लिया।
इस “स्वतः पदोन्नति” की चर्चा अब दबे स्वर में नहीं, पूरे विभाग में खुलेआम हो रही है।
इधर इंदौर संभाग के कमिश्नर ने खालवा की सीडीपीओ श्रीमती नेहा यादव को निलंबित कर दिया, उधर विभाग को यह संदेश साफ़-साफ़ मिल गया—
यहाँ कार्रवाई दिखती है, बदलाव नहीं।
कलेक्टर ऋषव गुप्ता ने निलंबित अधिकारी का मुख्यालय जिला निर्वाचन कार्यालय, खंडवा तय करते हुए प्रतिदिन हाजिरी के निर्देश दिए हैं। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया कि अनुपस्थिति पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।
मतलब साफ है—
एक तरफ़ निलंबित अधिकारी रोज़ हाजिरी में व्यस्त रहेंगी,
दूसरी तरफ़ परियोजना का रिमोट किसी और के हाथों में रहेगा।
अब ज़रा व्यवस्था की इस विडंबना पर गौर कीजिए—
जिस सुपरवाइज़र पर जनवरी 2023 से खंडवा SDM कोर्ट में रिश्वत का मामला चल रहा है, वही पूरे आत्मविश्वास के साथ परियोजना की कमान थामे बैठी हैं।
जब सवाल उठता है, तो जवाब तैयार मिलता है—
“मामला न्यायालय में है, फैसला बाकी है।”
और जब तक फैसला बाकी है, तब तक जिम्मेदारी भी उन्हीं के पास सुरक्षित है।
यही “सिस्टम” अब खंडवा तक सीमित नहीं है।
बड़वानी जिले में जिला कार्यक्रम अधिकारी पर 4 करोड़ 56 लाख रुपये के कथित घोटाले की एफआईआर दर्ज है, प्रकरण आज भी जारी है—
लेकिन पद वही है, कुर्सी वही है, और अधिकार भी पूरे हैं।
यानी मामला SDM कोर्ट का हो या करोड़ों के घोटाले का—
पद पर कोई असर नहीं पड़ता।
सूत्र बताते हैं कि इन तमाम प्रशासनिक चमत्कारों के पीछे राजनीतिक संरक्षण की दीवार बेहद मज़बूत है।
सुपरवाइज़र को कांग्रेस से जुड़े प्रभावशाली ग्रामीण नेता परिवार का संरक्षण बताया जा रहा है, वहीं जिला महिला-बाल विकास अधिकारी बड़वानी के पूर्व जिला पंचायत उपाध्यक्ष की पत्नी हैं।
ऐसे में फाइलें भले धूल खाएँ, लेकिन पहचान और रिश्ते हमेशा चमकते रहते हैं।
अब बात करें सांझा चूल्हा योजना की।
भुगतान समय पर नहीं हुए तो मामला ऊपर तक पहुँचा।

बीते दो दिनों में भोपाल स्थित मुख्य कार्यालय/संभाग से दो बार जवाब-तलब के पत्र जारी हो चुके हैं।
पत्र पर पत्र आ रहे हैं, लेकिन सवाल वही पुराना है—
क्या जवाब-तलब से व्यवस्था सुधरेगी,
या सिर्फ काग़ज़ों की गिनती बढ़ेगी?
कुल मिलाकर महिला एवं बाल विकास विभाग की तस्वीर कुछ यूँ है—
SDM कोर्ट में मामला चल रहा है,
करोड़ों की एफआईआर दर्ज है,
भोपाल से जवाब-तलब हो रहे हैं,
निलंबित अधिकारी हाजिरी पर हैं,
और बाकी सब कुर्सी पर।
महिलाओं और बच्चों का कल्याण कहीं पीछे छूट गया है,
आगे है तो सिर्फ संतुलन, संरक्षण और चुप्पी।
और अंत में विभागीय गलियारों से उठती वह चर्चा, जो पूरी कहानी का निचोड़ है—
सुपरवाइज़र के परियोजना अधिकारी की भूमिका में आते ही निलंबित सीडीपीओ नेहा यादव को जिले के लगभग सभी विभागीय व्हाट्सऐप ग्रुपों से ने बाहर कर दिया गया।
जिन ग्रुपों में कल तक नेहा यादव के निर्देश चलते थे, आज उन्हीं ग्रुपों में वही सुपरवाइज़र सक्रिय हैं, जो कभी उनके अधीनस्थ थीं।
यानी यहाँ आदेश फाइलों से नहीं,
पहले व्हाट्सऐप ग्रुपों से जारी होते हैं।
और कुर्सी पर बैठने से पहले
डिजिटल कब्ज़ा ज़रूरी हो चुका है।
अब देखना सिर्फ इतना है—
क्या कभी जाँच काग़ज़ों से निकलकर नतीजों तक पहुँचेगी,
या फिर यह पूरा मामला भी
चर्चाओं में गरम और सुधार में ठंडा होकर रह जाएगा।
इन्हीं सवालों और चर्चाओं के साथ
चर्चा न्यूज़ इस ख़बर को यहीं समाप्त करता है।















