
खंडवा महिला बाल विकास: अफसर टूर में, जिला सुपरवाइज़र के कंधों पर

यह खंडवा है साहब—यहाँ पद सुरक्षित रहते हैं,
और ज़िम्मेदारियाँ सीधा सुपरवाइज़र के कंधों पर डाल दी जाती हैं।
चर्चा न्यूज़ | विशेष रिपोर्ट
खंडवा महिला बाल विकास विभाग में इन दिनों प्रशासन नहीं, बल्कि आराम की व्यवस्था सुचारु बताई जा रही है। कुछ समय पूर्व तक जो अधिकारी एडी जिला परियोजना अधिकारी थे, वे अब सिर्फ बाल संप्रेषण गृह अधिकारी बनकर सीमित दायरे में मौज करते नज़र आते हैं। जिस बाल संप्रेषण गृह को वर्षों तक सुपरवाइज़र ने जिम्मेदारी से संचालित किया, वहां अब चार्ज लेकर भी सक्रियता गायब है।
इसका सीधा असर यह हुआ कि जिले की पूरी प्रशासनिक भागदौड़ सुपरवाइज़र के कंधों पर आ गई, और ऊपर बैठे अधिकारी निश्चिंत हो गए। नतीजतन खंडवा डीपीओ टूर के नाम पर अक्सर नदारद रहती हैं।
संचनालय का पत्र बना असली सवाल
भोपाल संचनालय ने रेणु सोनी प्रकरण में DEDO पावर प्राप्त महिला बाल विकास अधिकारी को शासकीय पक्ष से पेशी पर अनिवार्य रूप से उपस्थित होने का पत्र भेजा था। लेकिन स्वयं पेशी पर जाने के बजाय उक्त शासकीय पत्र को सीडीपीओ खालवा की ओर मोड़ते हुए जवाब तलब कर लिया गया।
इस पर संचनालय ने इसे शासकीय पत्र की अवहेलना और दुरुपयोग मानते हुए सात दिवस में स्पष्टीकरण मांगा है—कि जब पत्र नामित अधिकारी के लिए था, तो उसे किसी अन्य अधिकारी के नाम भेजने का अधिकार किस नियम के तहत लिया गया।
चार्ज ऊपर, काम नीचे
विभागीय हकीकत यह है कि जहां एडी का चार्ज परियोजना अधिकारी को मिलना था, वहां सीधे सुपरवाइज़र को परियोजना अधिकारी जैसा दायित्व दे दिया गया। यानी पद काग़ज़ों में और काम ज़मीन पर—वह भी सुपरवाइज़र के भरोसे।
सूत्रों के अनुसार यह कोई नया मामला नहीं। पहले भी ऐसे कई शासकीय पत्र आए, गए और फाइलों में दब गए, पर कार्यशैली जस की तस रही।
निष्कर्ष
बाल संप्रेषण गृह हो या जिला कार्यालय—
खंडवा महिला बाल विकास विभाग में अफसर सुविधा में हैं,
और पूरा जिला सुपरवाइज़र के कंधों पर चल रहा है।
अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि संचनालय का यह पत्र सिर्फ फाइल बनेगा या व्यवस्था बदलेगा—
इसी पर, चल रही है चर्चा।















