सवाल पूछा तो भ्रष्ट समझ लिया? खंडवा नगर निगम की कार्यसंस्कृति पर बड़ा सवाल
चर्चा न्यूज़
खंडवा नगर निगम में हालिया घटनाक्रम ने शहर में एक नई चर्चा को जन्म दे दिया है—
अगर कोई अधिकारी काम का हिसाब पूछ ले और कर्मचारी उसे ‘भ्रष्टाचार का आरोप’ मान लें, तो इसका अर्थ क्या निकाला जाए?
15 दिसंबर को पट्टा सर्वे प्रशिक्षण के दौरान खंडवा एसडीएम द्वारा निगम कर्मचारियों से लंबित आवेदनों और कार्य प्रगति को लेकर सवाल पूछे गए। यह सवाल प्रशासनिक दृष्टि से सामान्य थे, लेकिन निगम कर्मचारियों को लगा कि उन्हें भ्रष्ट कहा जा रहा है।
और यहीं से शुरू हुआ—काम बंद, नारेबाजी, तालाबंदी और “कर्मचारी एकता” का प्रदर्शन।
यहां सवाल एसडीएम के शब्दों से ज्यादा कर्मचारियों की प्रतिक्रिया पर उठता है।
अगर किसी अधिकारी द्वारा काम की स्थिति पूछने पर यह भावना बनती है कि हमें भ्रष्ट कहा जा रहा है, तो इसका अर्थ क्या है?
क्या सवाल ही आईना बन गया?
या आईने में दिखता सच असहज कर गया?
खंडवा नगर निगम की कार्यशैली कोई अनजान विषय नहीं है। शहर पहले से जानता है कि यहां
काम की गति धीमी हो सकती है,
फाइलें रुकी रह सकती हैं,
लेकिन काम पर सवाल उठना अस्वीकार्य है।
कर्मचारियों ने चंद पार्षदों और जनप्रतिनिधियों के साथ मिलकर यह संदेश भी दे दिया कि
जवाबदेही से पहले एकजुटता ज़रूरी है।
सवालों का जवाब देने से बेहतर है, सवाल पूछने वाले पर ही सवाल खड़े कर देना।
एसडीएम का पक्ष स्पष्ट है—किसी को भ्रष्ट कहने की मंशा नहीं थी, केवल पहले से आए आवेदनों के बारे में जानकारी मांगी गई थी। फिर भी भावनाएं आहत हुईं, तो खेद भी जता दिया गया।
यानी सवाल भी वापस, माफी भी साथ।
अब चर्चा का असली मुद्दा यह नहीं है कि
❓ एसडीएम ने क्या कहा
बल्कि यह है कि
❓ काम की समीक्षा को अपमान क्यों समझा गया?
यह पूरा घटनाक्रम खंडवा नगर निगम की उस कार्यसंस्कृति को उजागर करता है, जहां
सवाल पूछना संदेह है,
जवाब मांगना अपमान है,
और आंदोलन सबसे मजबूत तर्क।
चर्चा न्यूज़ में आज यही सवाल सबसे ऊपर है—
अगर जवाबदेही पूछने पर ही भ्रष्टाचार का एहसास होने लगे,
तो फिर जवाबदेही से डर किस बात का है?















