
मुरैना में अफ़सरशाही का नया ‘रोमांटिक अध्याय’, प्रशासनिक मर्यादा फिर कटघरे में
“कुर्सी की शालीनता भूलकर निजी शौक़ में मशगूल मुरैना के अधिकारी, आशिक़ मिज़ाजी के आरोपों ने प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया”
मुरैना ज़िले में अधिकारियों पर लग रहे आशिक़ मिज़ाजी के आरोप अब अपवाद नहीं, बल्कि एक असहज परंपरा बनते जा रहे हैं। कभी सबलगढ़ के एसडीएम, तो अब कैलारस जनपद पंचायत के सीईओ—आरोपों की सूची लंबी होती जा रही है और प्रशासनिक छवि छोटी।
ताज़ा मामला कैलारस जनपद पंचायत से सामने आया है, जहाँ सीईओ रामपाल करजरे पर एक महिला कर्मचारी ने गंभीर आरोप लगाए हैं। महिला कर्मचारी ने कलेक्टर को लिखित शिकायत सौंपकर बताया है कि कार्यालय में कामकाज से ज़्यादा अनचाही बातचीत और मानसिक दबाव का माहौल बनाया गया।
शिकायत के मुताबिक, महिला कर्मचारी से शाम के बाद और रात तक फोन पर बात करने का दबाव डाला जाता था। बातचीत से इनकार करने पर नौकरी से जुड़ी धमकियाँ दी जाती थीं। काम में कोई गलती न होने के बावजूद विभागीय नोटिस थमाए जाते और सवाल उठाने पर सरकारी भाषा छोड़कर अपशब्दों का सहारा लिया जाता था।
यानि, फाइलों की जगह फोन कॉल, और प्रशासनिक आदेशों की जगह व्यक्तिगत अपेक्षाएँ—कुछ अफ़सरों की प्राथमिकताएँ साफ़ झलकने लगी हैं।

महिला कर्मचारी ने आवेदन में प्रशासन से न्याय की गुहार लगाई है। वहीं, एक के बाद एक सामने आ रहे ऐसे मामलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मुरैना में कुछ अधिकारी कुर्सी को जिम्मेदारी नहीं, बल्कि निजी सुविधा का साधन समझ बैठे हैं?
हालाँकि, फिलहाल ये सभी आरोप जांच के दायरे में हैं और सत्यता का फैसला जांच के बाद ही सामने आएगा। लेकिन बार-बार उठते ऐसे मामलों ने यह तय कर दिया है कि मुरैना की अफ़सरशाही अब सवालों से नहीं, संशयों से घिरी हुई है।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस बार केवल फाइलों में जांच करेगा, या सचमुच मर्यादा बचाने के लिए कोई ठोस कदम भी उठाएगा।















