कुपोषण पर गंभीर मीटिंग—और विभाग अपनी ही अव्यवस्थाओं के ‘पोषण’ में लगा!

मिशन आंचल शुरू—पर विभाग में बैग-बवाल, चार्ज की राजनीति और अधिकारी पर पुराने आरोपों की परछाई
चर्चा न्यूज़ –(सुशील विधाणी)
खंडवा।
जिले में मिशन आंचल अभियान की शुरुआत तो पूरे उत्साह के साथ हुई, लेकिन चर्चा न्यूज़ की रिपोर्ट बताती है कि विभागीय गलियारों में कुपोषण से ज्यादा चर्चा विभाग के अपने “कुपोषित प्रबंधन” को लेकर है।
कलेक्ट्रेट के सभाकक्ष में कलेक्टर ऋषव गुप्ता ने गंभीर बैठक ली, निर्देश दिए, योजनाएँ समझाईं—लेकिन बाहर की दुनिया में सवाल वही पुराना है:
“क्या विभाग खुद ठीक है, कि जिले के बच्चों को ठीक करेगा?
“खालवा का विकास शायद इसी को कहते हैं,
जहाँ कुपोषण की गिनती हर साल खुद को ही मात देते दिखती है।
अभी 221 मासूम इसकी ‘उपलब्धि’ गिना रहे हैं,
मानो कुपोषण में अव्वल रहना यहाँ की पुरानी परंपरा हो।
देश में चर्चा हो तो भी क्या नया—
खालवा का नाम तो हमेशा इसी वजह से चमकता है, जैसे यही इसकी पहचान हुआ हो।”

पुराने आरोपों की परछाई फिर चर्चा में
जिले में तैनात मुख्य जिला महिला बाल विकास अधिकारी को लेकर भी चर्चाएँ फिर जोर पकड़ रही हैं।
“क्या वे यहाँ काम करने आई हैं, या रिटायरमेंट तक समय शांतिपूर्वक निकालने?”
निरीक्षण के नाम पर ‘गायब मोड’—चर्चा तेज
चर्चा यह भी है कि अधिकारी महोदय निरीक्षण के नाम पर अक्सर जिले से बाहर ही दिखती हैं,
और विभागीय कार्यों का ज़मीनी असर उतना नहीं दिखा जितना उनके पद से अपेक्षित है।
लोगों का कहना है कि कुपोषण के मुद्दे पर अब तक कोई “अनूठा” काम जिले में नहीं दिखा,
बल्कि विभाग के अंदर का ही कुपोषण—व्यवस्था का, अनुशासन का, चार्ज का—और बढ़ गया है।
खंडवा के कलेक्टर ऋषभ गुप्ता उन अधिकारियों में हैं
जो किसी काम को आधा छोड़ने में विश्वास ही नहीं रखते।
अब उन्होंने कुपोषण को जड़ से उखाड़ फेंकने की ठान ली है—
और इस बार प्रशासन कागज़ी बैठकों में नहीं,
बल्कि सीधे मैदान में उतरा हुआ है।
उधर महिला-बाल विकास विभाग की कहानी तो और भी मज़ेदार है—
जहाँ सुपरवाइज़र को फील्ड में बच्चों की जांच करनी चाहिए,
वहाँ विभाग का ज्यादा ध्यान इस बात पर रहता है
कि किसे ‘सीडीपीओ का चार्ज’ थमा दिया जाए।
मानो कुपोषण नहीं, चार्ज-वितरण ही विभाग की सबसे बड़ी उपलब्धि हो!
लेकिन अब खेल बदल चुका है—
कलेक्टर ने इस विभाग की कमान
आईएएस अधिकारी सृष्टि देशमुख गौड़ा के हाथों में दी है।
और वह उन अधिकारियों में से हैं
जो लड़ाई शुरू होने के बाद
उसका अंत किए बिना पीछे मुड़कर नहीं देखतीं।
अब विभाग की ढिलाई और पुराने तौर-तरीके
कलेक्टर की सख्ती और सृष्टि गौड़ा की तेज़ कार्यशैली—
इन दोनों के सामने कितने दिन टिक पाएँगे,
यह देखने लायक होगा।
अब उम्मीद यही है कि
जिन फ़ाइलों में वर्षों से ‘कुपोषण हटाओ’ लिखा रहता था,
वह फ़ाइलें पहली बार सच में
जमीन पर भी काम करती नज़र आएँ—
और कुपोषण की जंग में खंडवा इस बार जीत दर्ज करे।”*

बैग-बहस से लेकर सुपरवाइजरों की फटकार तक—विभाग में दैनिक ड्रामा
सुपरवाइजर शीला द्वारा अधिकारी का बैग उठाने का विवाद,
दूसरी सुपरवाइजर से तकरार,
बीच में ग्रामीण मंडल अध्यक्ष की माताराम का कूदकर झगड़ा रोकना,
और फिर खंडवा जिला पंचायत उपाध्यक्ष के सहायक द्वारा फोन पर सुपरवाइजरों की कड़ी फटकार…
इन घटनाओं ने विभाग की व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
बैग तो गिरा ही—साथ में विभाग की साख भी सरक गई।
इसके बाद अधिकारी का “बोर्ड टाइट” होने और “किसे खुश किया जाए तो चार्ज मिल जाए” वाली चर्चा फिर से जोर पकड़ चुकी है।
चार्ज की राजनीति—जिले में सुपरवाइजर ही विभाग चला रहे?
जिला कार्यालय में यह भी चर्चा है कि—
– ग्रामीण का चार्ज सुपरवाइजर के पास,
– एडीपीओ की जगह भी सुपरवाइजर,
– खालवा परियोजना का चार्ज सीडीपीओ की जगह सुपरवाइजर को पैच कर दिया गया,
– वन स्टॉप सेंटर से लेकर ग्रामीण कार्यालय तक—हर ओर सुपरवाइजरों का ‘राज’।
लोग मजाक में कह रहे—
“कुपोषण से लड़ने का मिशन तो चल रहा है, पर विभाग खुद चार्ज से कुपोषित है!”
मिशन आंचल—अच्छा अभियान, पर असली चैलेंज विभाग खुद?
कलेक्टर की मंशा स्पष्ट है—समुदाय की मदद से बच्चों को कुपोषण से मुक्त करना।
‘पोषण बापू’, ‘पोषण मैया’, पोषण टोकरी, पोषण वाटिका…
योजनाएँ अच्छी हैं।
लेकिन जिले में सबसे बड़ी चर्चा यही घूम रही—
*“जब विभाग का नेतृत्व ही विवादों, अनुपस्थिति और राजनीतिक संबंधों की चर्चा में घिरा हो…
तब कुपोषण हटेगा या योजनाएँ ही कुपोषित रह जाएँगी?”**
यही है अभी की चलती चर्चा।
(नोट: यह सब जिला भर में चल रही चर्चाएँ हैं, आधिकारिक पुष्टि नहीं।)















