(चर्चा न्यूज़ सुशील विधाणी)
देश में चर्चा है — खंडवा महिला बाल विकास विभाग में “कुर्सी बड़ी या जिम्मेदारी?”
खंडवा में आज की सबसे बड़ी चर्चा किसी योजना, पोषण अभियान या महिला सशक्तिकरण की नहीं…
बल्कि अधिकारी–राजनीति–संबंधों के उस खेल की है, जिसमें काम कम और रसूख ज़्यादा चलता दिखा।
और अंत में हुआ वही, जो कई महीनों से फाइलों में लिखा जा चुका था —

संभागायुक्त ने खालवा की परियोजना अधिकारी नेहा यादव को निलंबित कर दिया।
“काम रुका, सिस्टम झुका — और शिकायतों ने आखिर बोल दिया!”
खंडवा जिला प्रशासन को महीनों से गुलाई, रोशनी, सेंधवाल, लखनपुर बंदी और खारकलां सेक्टर में अनियमितताओं की शिकायतें मिल रही थीं।
कलेक्टर ऋषव गुप्ता ने 31 अक्टूबर को डिप्टी कलेक्टर सृष्टि देशमुख की टीम को आकस्मिक निरीक्षण पर भेजा।
75 आंगनबाड़ी केंद्रों पर जांच हुई और परिणाम उतने ही हैरान करने वाले थे, जितना विभाग का आत्मविश्वास।
कागज़ों में पोषण —
मैदान में अनुपालन शून्य।
पोषण आहार से लेकर उपस्थिति और योजनाओं के क्रियान्वयन तक —
सब कुछ कागज़ पर गोल-गोल… जवाबों में ढोल-ढोल… और जमीनी हालात में शून्य।
निलंबन क्यों? जवाब — ‘गोल-मोल’
कलेक्टर ने 7 नवंबर को कारण बताओ नोटिस जारी किया, लेकिन उसका जवाब ऐसा मिला जैसे कोई बच्चा स्कूल में होमवर्क भूल जाए और कह दे —
“मैडम… हो गया था… पर कॉपी घर रह गई।”
बस, प्रशासन की धैर्य सीमा यहीं खत्म।
फाइल संभागायुक्त के पास गई — और
2 दिसंबर को आदेश आया — “निलंबित।”
निलंबन अवधि में महोदय मुख्यालय — कलेक्टर ऑफिस खंडवा।
(क्योंकि घर पर रहने वाला निलंबन आजकल ट्रेंड में नहीं।)
अब असली कहानी — “काम नहीं, लिंकअप ही पहचान”
यहीं से चर्चा गर्म।
यह सिर्फ एक अधिकारी के निलंबन की खबर नहीं —
यह उस सिस्टम की कहानी है जहां:
मंत्री के नज़दीकी होना काम से बड़ा माना जाता है
विभागीय अधिकारी का मोबाइल नेटवर्क 4G से तेज़ राजनीतिक लिंकअप पर चलता है
और जहां आदेश मैदान में नहीं, इंदौर की कॉफ़ी टेबल पर बनते हैं।
सूत्र कहते हैं —
सप्ताह में दो दिन खंडवा,
बाकी दिन निरीक्षण के नाम पर “इंदौर — मुख्यालय अनिवार्य नहीं, रिश्ते ज़रूरी।”
पुराना रिकॉर्ड भी चमचमाता नहीं
बताया जा रहा है कि पूर्व में भी:
भवन निर्माण घोटाला
करोड़ों की अनियमितताएँ
और बड़वानी में जांच
इन सबके बाद भी साहब–साहिबा की जोड़ी का प्रभाव ऐसा कि
पद भी मिला और प्रतिष्ठा भी बरकरार रही।
क्योंकि स्थानीय अफवाहों के अनुसार —
कांग्रेस शासनकाल में इनके पति बड़वानी जिला पंचायत उपाध्यक्ष रह चुके हैं।
और वहीं से “पद से बड़ा पद-प्रभाव” शुरू हुआ था।
विभाग की अंदरूनी कहानी — “दो राजा, एक राज्य”
विभाग में प्रोजेक्ट ऑफिसर और सीडीपीओ की जोड़ी ने हालात ऐसे बना दिए कि:
एक कहता — “मेरा लिंक बड़ा”
दूसरा कहता — “मेरा आदेश बड़ा”
और बीच में
योजनाएँ
बच्चों का पोषण
आंगनबाड़ी व्यवस्था
सब कुछ — कुर्सियों की लड़ाई में धूल खाते रहे।
आज की कटु सच्चाई —
– आंगनबाड़ी में बच्चों को पोषण नहीं मिला
– माता–शिशु योजनाएँ अधर में और विभाग की ऊर्जा निरीक्षण में नहीं, इमेज बिल्डिंग में खर्च हुई।
खंडवा में आज की चर्चा हाईलाइट —
“सिस्टम में योग्यता से बड़ी चीज़ अगर कोई है —
तो वह है जुड़ाव और दबाव।
लेकिन ये खेल हमेशा नहीं चलता —
आज फाइलें बोल पड़ीं, और कुर्सी हिल गई।”
अंत में —
यह निलंबन सिर्फ एक कार्रवाई नहीं,
बल्कि एक संदेश है कि:
“विभाग सत्ता का अहाता नहीं — बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी है।”
“जनता की योजनाएँ फॉर्मलिटी नहीं — वास्तविक क्रियान्वयन मांगती हैं।”
















