(चर्चा न्यूज़ सुशील विधाणी)
खंडवा में आजकल चर्चा न्यूज़ नहीं… “डिबेट न्यूज़” चल रही है — और हो भी क्यों न?
कई लोगों ने अब पत्रकारिता को नहीं… मोबाइल कैमरे को प्रोफेशन मान लिया है।
जिसे न अनुभव, न नियमों की समझ, न संस्थान का नाम…
वही आज खुद को “ज़िला मीडिया सलाहकार-महासचिव-डिबेट डॉन” बताकर दो पक्षों को भिड़ाने में लगा है।
कभी शहर की समस्याओं पर पदयात्रा,
तो कभी लाइव बहस में दो लोगों को लड़ाकर व्यूज की यात्रा।
कहते हैं पत्रकार का धर्म सत्य दिखाना होता है,
लेकिन इनके लिए मिशन सिर्फ इतना है:
“दो लोगों को भिड़ाओ, वीडियो बनाओ, वायरल करवाओ और व्यूज से चाय-समोसा कमाओ!”
आज हालत ये है कि असली पत्रकार पहचान पत्र दिखाए,
और ये लोग सिर्फ अपना यूट्यूब लिंक और व्हाट्सएप डीपी।
मीडिया कर्मियों की मेहनत और छवि को
ये रोज़ाना रिचार्ज पर चलने वाला पत्रकारिता पैक बर्बाद कर रहा है।
प्रशासन से जनता की उम्मीद:
पहले जांच यह हो — जो बहस करवा रहा है
वह किसी प्लेटफार्म का पत्रकार है
या सिर्फ कॉमेंट बॉक्स वाला “डिबेट वॉरियर”?
क्या उसके पास मान्यता है?
क्या वह किसी संगठन का प्रवक्ता है?
या बस “भिड़वा-टु-भिड़वा प्रोडक्शन हाउस” का मालिक?
और यह खबर चर्चा में इसलिए है, क्योंकि हाल ही में एक बहस में विकास का मुद्दा तो गायब हो गया…
पर शांत शहर में धर्म आधारित फूट और अपमान का नया अध्याय शुरू हो गया।
निष्कर्ष:
पत्रकारिता चौथा स्तंभ है —
कॉमेडी कंटेंट बनाने का कैमरा नहीं।
शहर उम्मीद करता है —
अगली डिबेट बुद्धि और नियमों पर हो,
न कि अहंकार और व्यूज पर।
चर्चा जारी है… क्योंकि मामला व्यूज का नहीं, ज़िम्मेदारी का है।
















